गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख और उत्साहपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह उत्सव भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में, विशेषकर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विघ्नहर्ता भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ था।
गणपति स्थापना एवं विसर्जन की तिथियां
| अवसर | तिथि | शुभ मुहूर्त / समय |
| गणेश स्थापना (स्थापना तिथि) | 14 सितंबर 2026 (सोमवार) | सुबह 11:02 बजे से दोपहर 01:31 बजे तक |
| डेढ़ दिन का विसर्जन | 15 सितंबर 2026 | दोपहर 12:16 बजे से 01:48 बजे तक |
| 5वें दिन का विसर्जन | 18 सितंबर 2026 | सुबह 06:07 बजे से 10:43 बजे तक |
| मुख्य विसर्जन (अनंत चतुर्दशी) | 25 सितंबर 2026 (शुक्रवार) | पूरे दिन (विभिन्न शुभ चौघड़िया मुहूर्त) |
उत्सव का महत्व और इतिहास
भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य या पूजा-अनुष्ठान से पहले श्री गणेश का आह्वान किया जाता है।
गणेशोत्सव का ऐतिहासिक महत्व भी बहुत गहरा है। छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में यह उत्सव एक सार्वजनिक परंपरा बना। आगे चलकर सन् 1893 में स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे एक भव्य सार्वजनिक रूप दिया, ताकि समाज के लोग एक साथ आकर एकजुट हो सकें और स्वतंत्रता संग्राम को बल मिले।
पूजा विधि और परंपराएं
- स्थापना: गणेश चतुर्थी के दिन भक्त बप्पा की मिट्टी की प्रतिमा घर या सार्वजनिक पंडालों में लाते हैं। विधि-विधान से ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कर धूप, दीप, दूर्वा, चंदन और लाल फूल अर्पित किए जाते हैं।
- प्रिय भोग: भगवान गणेश को मोदक और लड्डू सबसे प्रिय हैं। 10 दिनों के दौरान रोज़ तरह-तरह के मिष्ठान और मोदक का भोग लगाया जाता है।
- विसर्जन: अनंत चतुर्दशी के दिन भक्त ढोल-नगाड़ों और “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ“ के जयकारों के साथ गणपति जी को जल में विसर्जित करते हैं। विसर्जन का यह प्रतीक सिखाता है कि जो आकार में आता है, वह अंततः निराकार में विलीन हो जाता है।
रंजना






