Monday, September 28, 2026
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बहुआयामी संकटों के जवाब, टिकाऊ भविष्य की ओर पंजाब

पंजाब आज किसी एक समस्या का नहीं, बल्कि आपस में गहराई से जुड़े आर्थिक, कृषि, पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक संकटों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों को अलग-अलग करके नहीं समझा जा सकता, क्योंकि कृषि की मौजूदा संरचना भूजल पर भारी दबाव डाल रही है, पानी की घटती उपलब्धता खेती की लागत बढ़ा रही है, रोजगार के सीमित अवसर युवाओं को विदेश जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और राज्य की वित्तीय कठिनाइयाँ विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों को सीमित कर रही हैं।

सबसे गंभीर चिंता भूजल के तेजी से घटते स्तर की है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में भूजल की कुल निकासी, उपलब्धता की तुलना में लगभग 157 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। मूल्यांकन किए गए 153 क्षेत्रों में से 115 को ‘अति-दोहन’ वाली श्रेणी में रखा गया है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि मौजूदा धान-गेहूँ फसल चक्र को बदलने के लिए केवल किसानों को सलाह देना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ लाभकारी वैकल्पिक फसलें, सुनिश्चित खरीद, उचित कीमतें और बाजार की गारंटी भी आवश्यक है।

पराली जलाने के मामले में पंजाब ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान महत्वपूर्ण सुधार किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2020 में पराली जलाने की 83,002 घटनाओं के मुकाबले 2024 में यह संख्या घटकर 10,909 रह गई। यह लगभग 87 प्रतिशत की कमी है। फिर भी पराली प्रबंधन को केवल जुर्माने और निगरानी का मुद्दा बनाने के बजाय इसे किसान के लिए आय का स्रोत बनाने की आवश्यकता है। पराली से बिजली, जैव ईंधन, पशु-चारा और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाने वाली स्थानीय इकाइयों का नेटवर्क इस समस्या को अवसर में बदल सकता है।

पंजाब की अर्थव्यवस्था के सामने भी गंभीर चुनौतियाँ हैं। 2025-26 में राज्य की वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर लगभग 6.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन कृषि क्षेत्र में 2.5 प्रतिशत नकारात्मक वृद्धि का अनुमान चिंता का विषय है। 2026-27 के लिए राज्य का राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद का लगभग 4.1 प्रतिशत अनुमानित है। इसलिए पंजाब को कर्ज की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए विकास और जनकल्याण के लिए आवश्यक संसाधन भी पैदा करने होंगे।

रोजगार की स्थिति भी ध्यान मांगती है। अप्रैल से जून 2025 के दौरान कराए गए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार पंजाब में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की बेरोजगारी दर 8.8 प्रतिशत रही, जबकि महिलाओं में यह दर 13.5 प्रतिशत थी। इसलिए औद्योगीकरण का अर्थ केवल नए कारखाने लगाना नहीं होना चाहिए। आवश्यकता ऐसे उद्योगों की है जो उच्च उत्पादकता, कुशल रोजगार, स्थानीय कच्चे माल के उपयोग और बाहरी बाजारों में बिक्री के अवसर पैदा करें।

पंजाब के लिए पानी, कृषि और रोजगार के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, नशे की समस्या, शहरी बुनियादी ढाँचा और पर्यावरण संरक्षण भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। गाँवों में कृषि पर निर्भरता कम करने के लिए पशुपालन, बागवानी, मछली पालन, कृषि-आधारित छोटे उद्योग और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को मजबूत करना होगा। शहरों में स्वच्छ हवा, पीने का पानी, सीवरेज, कचरा प्रबंधन और सुचारु परिवहन को विकास की मुख्यधारा में लाना जरूरी है।

इसके बावजूद पंजाब के पास मजबूत मानव संसाधन, कृषि का अनुभव, उद्यमशीलता की भावना और देश-विदेश में बड़ा पंजाबी समुदाय जैसी बड़ी ताकतें मौजूद हैं। नीति आयोग के सतत विकास लक्ष्य सूचकांक 2023-24 में पंजाब का स्कोर 76 रहा, जो 2020-21 के 68 के मुकाबले सुधार दर्शाता है।

अब पंजाब को तत्काल लाभ वाली नीतियों के बजाय दीर्घकालिक सोच अपनानी होगी। पानी बचाने वाली खेती, फसल विविधीकरण, कृषि-आधारित उद्योग, कुशल रोजगार, पर्यावरण संरक्षण, मजबूत शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था, नशा मुक्ति, पारदर्शी प्रशासन और वित्तीय अनुशासन—ये सभी एक ही विकासात्मक दृष्टिकोण का हिस्सा होने चाहिए।

पंजाब की वास्तविक प्रगति का माप केवल आज की आय या आर्थिक वृद्धि नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना पानी बचा रहे हैं, कितने रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं और कैसा स्वस्थ, खुशहाल और टिकाऊ पंजाब छोड़कर जा रहे हैं।

यही आज की सबसे बड़ी नीतिगत परीक्षा है।

छत्रपाल सिंह

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