प्यार, मोहब्बत, इश्क, नौकरी, रिश्ते, एहसास, सहायता, दुश्मनी, दोस्ती, मोह, गुस्सा, हादसा, इत्तेफाक, किस्मत और तदबीर—ज़िंदगी के ये सभी शब्द कभी मानवीय भावनाओं, साझेदारी और रिश्तों की गर्माहट से जुड़े हुए थे। लेकिन आज इनमें से बहुत-से अनुभवों को भी इंसान लाभ, नुकसान, जरूरत, अवसर और बदले में मिलने वाली चीज़ों के हिसाब से इस्तेमाल करने लगा है। क्या मानव जीवन धीरे-धीरे एक ऐसे बाज़ार में बदल रहा है, जहाँ हर रिश्ते की कोई कीमत और हर एहसास का कोई व्यावसायिक मूल्य है?
रिश्ता अपने मूल रूप में लेन-देन नहीं होता। माँ का प्यार इसलिए नहीं होता कि बच्चा बदले में कुछ देगा। दोस्ती का मतलब यह नहीं कि दोस्त हर मुश्किल समय में कोई लाभ देगा। प्यार का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला हमारी सभी इच्छाएँ पूरी करेगा।
लेकिन आधुनिक जीवन में एक नई सोच मजबूत हो रही है—“रिश्तों का यह नेटवर्क मेरे लिए कितना उपयोगी हो सकता है?”
जब यह सवाल हर रिश्ते का केंद्र बन जाता है, तो रिश्ता धीरे-धीरे साझेदारी से सौदे में बदल जाता है।
आज कई बार दोस्ती इस बात से मापी जाती है कि दोस्त कितना प्रभावशाली है। जान-पहचान इस बात से कि उससे कौन-सा काम निकल सकता है। विवाह में भी अक्सर जात-पात से अलग हटकर, प्रेम से पहले आय, संपत्ति, सामाजिक हैसियत और भविष्य के लाभ की गणना होने लगती है। नौकरी में योग्यता के साथ-साथ “नेटवर्क” की कीमत बढ़ती जा रही है।
प्यार मानव सभ्यता की सबसे पुरानी भावनाओं में से एक है। लेकिन डिजिटल युग ने प्यार को भी बाज़ार की भाषा से जोड़ दिया है।
डेटिंग ऐप्स, सोशल मीडिया, विज्ञापन, निजी ब्रांडिंग और दिखावे पर केंद्रित संस्कृति ने मानवीय आकर्षण को कई बार एक “प्रोफ़ाइल” में बदल दिया है। व्यक्ति को उसकी पूरी शख्सियत के साथ जानने की बजाय उसकी तस्वीरों, पेशे, आय, रहन-सहन और सामाजिक दर्जे के आधार पर तौला जाता है। इससे प्यार खत्म नहीं हुआ है, लेकिन प्यार के आसपास व्यावसायिक मापदंड जरूर बढ़े हैं।
इसका एक दूसरा पहलू भी है। आधुनिक तकनीक ने अकेले इंसान को संपर्क के नए अवसर भी दिए हैं। 2026 की एक मनोवैज्ञानिक शोध में यह भी जांचा गया है कि भुगतान-आधारित साथी सेवाएँ कुछ परिस्थितियों में अकेलेपन को कम करने के लिए सामाजिक जुड़ाव का अनुभव प्रदान कर सकती हैं। इससे पता चलता है कि बाज़ार और मानवीय भावनाओं का संबंध सीधे तौर पर केवल काला या सफेद नहीं है।
पुरानी दोस्ती में एक दोस्त दूसरे के दुख में उसके साथ खड़ा होता था। आज “नेटवर्किंग” एक पेशेवर कौशल बन चुकी है। संपर्क बनाना अपने आप में आर्थिक पूंजी बन गया है। किसी व्यक्ति की पहचान और जान-पहचान कई बार उसकी योग्यता जितनी महत्वपूर्ण मानी जाने लगी है।
यहाँ एक बारीक फर्क समझना जरूरी है कि नेटवर्क बुरा नहीं है, लेकिन अगर हर दोस्ती को नेटवर्क समझ लिया जाए तो दोस्ती की आत्मा कमजोर हो जाती है।
मानवीय रिश्ते केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे हमें कुछ देते हैं। वे इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि वे हमें यह एहसास देते हैं कि हम अकेले नहीं हैं।
सबसे बड़ा बदलाव शायद “सहायता” के अर्थ में आया है।
कभी किसी की मदद करना मानवीय कर्तव्य समझा जाता था। अब कई बार मन में पहला हिसाब होता है—“मैंने इसकी मदद की है, यह मेरे कब काम आएगा?” इस तरह मदद “नेकी” से “निवेश” बन जाती है।
लेकिन शोध बताता है कि दूसरों की मदद करना केवल पाने वाले के लिए ही नहीं, बल्कि देने वाले के लिए भी मानवीय कल्याण से जुड़ा है। विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2025 ने दान, सेवा और अजनबियों की मदद जैसे परोपकारी व्यवहार को बेहतर जीवन-तंदरुस्ती से जोड़ा है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर मदद बिना किसी सीमा के करनी चाहिए। मतलब यह है कि मदद की कीमत हमेशा बदले में मिलने वाली चीज़ नहीं होती।
नौकरी भी मानव जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब काम का पूरा मूल्य केवल वेतन, पद और पदोन्नति से होने लगे तो इंसान अपनी पहचान को भी अपनी आर्थिक उपयोगिता से जोड़ लेता है। फिर “मैं कौन हूँ?” का जवाब बन जाता है—“मैं क्या करता हूँ?”
इससे बेरोजगारी केवल आय का संकट नहीं रहती; यह आत्म-मूल्य का संकट भी बन सकती है।
दूसरी ओर, कार्यस्थल पर अच्छे मानवीय संबंध क्षमता, सहयोग और विश्वास के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। विश्व खुशहाली रिपोर्ट में सामाजिक जुड़ाव को पेशेवर सहयोग, विश्वास और तंदरुस्ती से जोड़ा गया है।
सोशल मीडिया ने एक और बदलाव किया है। इंसानी एहसास को दिखावे में बदल दिया है।
दुख की तस्वीर, प्यार की पोस्ट, दोस्ती की तस्वीर, समाज-सेवा की वीडियो—हर चीज को “दिखाने” की जरूरत महसूस होने लगी है।
इससे असली एहसास और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन के बीच का अंतर बहुत बढ़ गया है।
कई बार इंसान सचमुच दुखी नहीं होता, लेकिन दुखी दिखना चाहता है। कई बार सेवा से ज्यादा सेवा की तस्वीर महत्वपूर्ण हो जाती है।
यहाँ समस्या तकनीक नहीं, बल्कि यह है कि हम अपनी अंदरूनी जिंदगी को बाहरी प्रतिक्रिया से मापने लगे हैं।
दुश्मनी मानव इतिहास की पुरानी भावना है। लेकिन आज दुश्मनी सिद्धांत की नहीं, हितों की होती जा रही है।
जब हित बदलते हैं तो दोस्त दुश्मन और दुश्मन दोस्त बन जाता है।
यह राजनीति से लेकर कारोबार, परिवार और सामाजिक जीवन तक दिखाई देता है।
इसलिए आज सबसे बड़ी चुनौती केवल दुश्मन को पहचानना नहीं, बल्कि स्वार्थ और सिद्धांत के बीच अंतर पहचानना है।
समाज की व्यापारी सोच का एक अजीब पहलू यह है कि जहाँ इंसान को दुख दिखाई देना चाहिए, वहाँ उसे “अवसर” दिखाई देने लगता है।
एक हादसा—किसी के लिए दुख, किसी के लिए खबर, किसी के लिए सामग्री, किसी के लिए दर्शक और किसी के लिए कारोबार।
यहाँ पत्रकारिता, सूचना और संवेदना के बीच संतुलन बहुत जरूरी है।
किसी दुख को लोगों तक पहुँचाना सामाजिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन दुख को केवल दर्शकों की संख्या में बदल देना मानवीय संवेदना के लिए खतरनाक पहलू है।
कभी इंसान सोचता था कि “किस्मत में जो लिखा है, वही मिलेगा।” फिर तदबीर ने इंसान को सिखाया कि “कोशिश कर, रास्ता बन सकता है।” आज समाज के व्यापार ने दोनों को नई भाषा दे दी है—मौका पहचानो, निवेश करो, परिणाम हासिल करो और आनंद लो।
इस सोच में मेहनत की अपनी जगह है। लेकिन अगर हर चीज को केवल परिणाम से मापा जाए तो इत्तेफाक, मानवीय साझेदारी, किस्मत, कृपा और अनपेक्षित मानवीय सहयोग जैसे तत्वों की अहमियत कम हो जाती है।
जब हर रिश्ते में स्वार्थ की संभावना दिखाई देने लगे तो विश्वास कम होता है।
इंसान सोचने लगता है—
“यह मेरे साथ अच्छा क्यों है?”
“इसे मुझसे क्या चाहिए?”
“यह मेरी मदद क्यों कर रहा है?”
यह मानसिकता सामाजिक जुड़ाव को कमजोर करती है।
WHO की 2025 की Commission on Social Connection ने सामाजिक अकेलेपन को स्वास्थ्य, तंदरुस्ती और समाज पर गंभीर प्रभावों से जोड़ा है। WHO ने सामाजिक स्वास्थ्य को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की तरह गंभीरता से लेने की जरूरत पर जोर दिया है।
विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2023 में दुनिया भर के 19 प्रतिशत युवाओं ने बताया कि उनके पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जिस पर वे मुश्किल समय में भरोसा कर सकें। यह आंकड़ा 2006 की तुलना में 39 प्रतिशत बढ़ा था।
यह आंकड़ा हमें एक बड़ी बात बताता है—संपर्क बढ़ने के बावजूद गहरा जुड़ाव कम हो रहा है। मोबाइल ने दूरी कम की, अकेलापन नहीं।
आज एक व्यक्ति के फोन में सैकड़ों या हजारों संपर्क होते हैं, लेकिन मुश्किल समय में फोन करने के लिए दो व्यक्ति भी न हों—यह आधुनिक समाज का बड़ा विरोधाभास है।
विश्व खुशहाली रिपोर्ट के शोध में भी सामाजिक संपर्क की संख्या और गुणवत्ता को अलग-अलग पहलू माना गया है। केवल लोगों की संख्या पर्याप्त नहीं है; भरोसेमंद सहायता और गहरा रिश्ता अधिक महत्वपूर्ण हैं।
संपर्क बहुत हो सकते हैं, लेकिन जुड़ाव कम।
यह कहना कि आज हर इंसान स्वार्थी है, तथ्यों के साथ न्याय नहीं करेगा। दुनिया भर में लोग आज भी दान करते हैं, अजनबियों की मदद करते हैं, बिना किसी लाभ के सेवा करते हैं, दोस्तों के लिए खड़े होते हैं और परिवार के लिए अपनी जरूरतों का त्याग करते हैं।
विश्व खुशहाली रिपोर्ट ने भी दिखाया है कि दूसरों की मदद करने वाला मानवीय व्यवहार व्यापक है और सामाजिक सहायता तंदरुस्ती से गहराई से जुड़ी हुई है।
इसलिए हमारी समस्या “कारोबार” नहीं है, बल्कि हर चीज को कारोबारी नजरिए से देखने की है।
कारोबार जरूरी है। पैसा जरूरी है। लाभ भी जरूरी है।
लेकिन अगर पैसा मानवीय रिश्ते का मालिक बन जाए, तो समस्या है।
मानवीय रिश्ते की कीमत यह नहीं कि उससे हमें कितना मिला। बल्कि यह है कि—
जब हमारे पास देने के लिए कुछ नहीं था, तब भी कौन हमारे साथ था।
जब कोई पद नहीं था, तब कौन सम्मान करता था।
जब पैसा नहीं था, तब कौन हाथ पकड़ता था।
जब गलती हुई, तब कौन समझाता था।
जब दुनिया ने पीठ मोड़ ली, तब कौन सामने खड़ा रहा।
यही वह दायरा है जहाँ रिश्ता व्यापार से अलग हो जाता है।
बाज़ार, तकनीक, पेशेवरता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा आधुनिक जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन इंसान को यह तय करना होगा कि उसकी जिंदगी में क्या बिक सकता है और क्या नहीं।
समय बिक सकता है, लेकिन प्यार नहीं।
मेहनत की कीमत हो सकती है, लेकिन सच्ची दोस्ती की नहीं।
सेवा पेशा हो सकती है, लेकिन दया केवल सौदा नहीं।
संपर्क बनाए जा सकते हैं, लेकिन विश्वास खरीदा नहीं जा सकता।
दौलत इकट्ठी की जा सकती है, लेकिन मानवीय निकटता केवल दौलत से नहीं मिलती।
मानव सभ्यता की सबसे बड़ी दौलत सोना, जमीन, पैसा या तकनीक नहीं है।
सबसे बड़ी दौलत वह इंसान है जो आपके साथ बिना किसी लाभ के खड़ा रहे।
क्योंकि बाज़ार में हर चीज की कीमत हो सकती है, लेकिन—
प्यार की कीमत नहीं होती,
दोस्ती का मूल्य नहीं होता,
एहसास का भाव नहीं होता,
और सच्चे रिश्ते का कोई विकल्प नहीं होता।
यही वह सीमा है जहाँ कारोबार खत्म होता है और इंसानियत शुरू होती है।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







