Saturday, October 10, 2026
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डिग्रियों के साथ हुनर का तंत्र, बेहतर रोजगार का मूल मंत्र

डिग्रियां बढ़ रही हैं, लेकिन रोजगार की जरूरतों के साथ क्षमताओं का मेल क्यों नहीं बैठ रहा?

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ा मुद्दा विद्यार्थी द्वारा हासिल की गई डिग्री नहीं, बल्कि यह है कि उसके पास बदलती कार्य दुनिया के लिए आवश्यक कौशल कितने हैं।

एक तरफ वे युवा हैं जो इंजीनियरिंग, गणित, कंप्यूटर विज्ञान, सांख्यिकी और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में विशेषज्ञ हैं, लेकिन अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखने, दूसरों को ध्यान से सुनने, टीम के साथ काम करने, नेतृत्व करने या मानवीय भावनाओं को समझने में पीछे रह जाते हैं।

दूसरी तरफ मानविकी, भाषा, कला, समाज विज्ञान और दर्शन के विद्यार्थी हैं, जिनके पास विचार-शक्ति, भाषाई क्षमता, तर्क और मानवीय व्यवहार को समझने की योग्यता होती है, लेकिन वे डिजिटल उपकरणों, आंकड़ों, एआई और स्वचालित कार्य प्रणालियों की बुनियादी समझ से वंचित रह जाते हैं।

यही वह अनदेखी खाई है, जिसे ‘कौशल की कमी और वृद्धि के बीच असंतुलन’ के रूप में समझा जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कौशल का असंतुलन केवल डिग्री और नौकरी के मेल न खाने तक सीमित नहीं है। इसमें योग्यता से अधिक शिक्षा होना, योग्यता से कम शिक्षा होना, किसी विशेष कौशल की कमी, श्रम बाजार में आवश्यक कौशलों की कमी और पढ़े गए विषय तथा किए जा रहे काम के बीच तालमेल की कमी भी शामिल है।

हमारी शिक्षा व्यवस्था ने लंबे समय से ज्ञान को अलग-अलग खानों में बांट रखा है। इनमें इंजीनियरिंग, चिकित्सा, वाणिज्य, कला, विज्ञान, कानून और प्रबंधन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

यह विभाजन अपने स्थान पर उपयोगी है, लेकिन आधुनिक कार्य जगत ने इन क्षेत्रों के बीच की दीवारों को काफी हद तक गिरा दिया है।

आज एक इंजीनियर के लिए केवल मशीन या तकनीक को समझना पर्याप्त नहीं है। उसे ग्राहकों, सहकर्मियों, प्रबंधकों और समाज के साथ प्रभावी बातचीत के माध्यम से तालमेल करना भी आना चाहिए।

इसी तरह एक पत्रकार, शिक्षक, वकील, प्रबंधक या समाज विज्ञान के विद्यार्थी के लिए केवल भाषा और विचार पर्याप्त नहीं रह गए हैं। उसे आंकड़ों, डिजिटल उपकरणों, एआई, सूचना की जांच और आधुनिक कार्य प्रणालियों की बुनियादी समझ भी होनी चाहिए।

अर्थात भविष्य का कर्मचारी केवल ‘तकनीकी’ या ‘गैर-तकनीकी’ नहीं होगा। उसमें तकनीकी समझ और मानवीय क्षमता का मेल होगा।

विश्व आर्थिक मंच की 2025 की भविष्य की रोजगार रिपोर्ट में तथ्य-आधारित सोच को सबसे महत्वपूर्ण प्रमुख कौशलों में शामिल किया गया है। इसके साथ रचनात्मक सोच, लचीलापन, नेतृत्व, सामाजिक प्रभाव, तकनीकी साक्षरता, सहानुभूति और सक्रिय रूप से सुनने जैसी क्षमताओं को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

इससे स्पष्ट है कि कंपनियों को अब केवल जानकारी रखने वाले लोग नहीं, बल्कि जानकारी का उपयोग करने और लोगों के साथ मिलकर काम करने वाले लोग चाहिए।

आज के समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालित कार्यों की चर्चा ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है।

अनेक दोहराए जाने वाले मानसिक कार्य, आंकड़ों की छंटाई, सूचना की प्रक्रिया और कार्यालयी कार्य अब मशीन-आधारित प्रणालियों और एआई के माध्यम से तेजी से किए जा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार एआई के बढ़ते उपयोग के साथ कार्यस्थल के कौशलों की प्रकृति बदल रही है। सोचने-समझने की उच्च स्तरीय क्षमता, सामाजिक और भावनात्मक कौशल, डिजिटल योग्यता और एआई के साथ काम करने की समझ की आवश्यकता बढ़ रही है।

अब हर व्यक्ति को कंप्यूटर प्रोग्रामर बनना जरूरी नहीं, बल्कि अपने कार्यक्षेत्र के अनुसार डिजिटल ज्ञान हासिल करना होगा।

जैसे पिछली सदी में पढ़ना और लिखना बुनियादी योग्यता मानी जाती थी, उसी तरह आज डिजिटल उपकरणों की समझ आधुनिक पेशेवर जीवन की बुनियादी आवश्यकता बनती जा रही है।

समस्या का एक और पहलू यह है कि विचार-विमर्श, सहानुभूति, सुनने की क्षमता, टीम वर्क, भावनात्मक संतुलन और नेतृत्व को अक्सर ‘सॉफ्ट स्किल्स’ कहकर कम महत्व दिया जाता है।

कई तकनीकी शिक्षा संस्थानों में यह सोच देखने को मिलती है कि ये तो सामान्य समझ की बातें हैं, इन्हें अलग से सिखाने की क्या जरूरत है। यह पहले से बनी हुई सोच गलत है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की वयस्क कौशल सर्वेक्षण संबंधी शोध में सामाजिक और भावनात्मक क्षमताओं का रोजगार, वेतन और काम से संतुष्टि के साथ स्वतंत्र संबंध दर्ज किया गया है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल बहुत बोलने वाला या आत्मविश्वासी व्यक्ति ही सफल होता है। असल बात यह है कि विचारशील क्षमता और सामाजिक-भावनात्मक योग्यता अलग होने के बावजूद कार्यजीवन में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

इसलिए तकनीकी शिक्षा में विचार-विमर्श को कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं, बल्कि पेशेवर योग्यता का हिस्सा माना जाना चाहिए।

संचार की शिक्षा को केवल आंखों में आंखें डालकर बात करने, सीधे खड़े होने या आत्मविश्वास दिखाने तक सीमित करना भी गलत होगा। शारीरिक भाषा से आगे संवाद होता है। वास्तविक पेशेवर बातचीत में ध्यान से सुनना, उचित प्रश्न पूछना, जटिल विचार को सरल बनाकर समझाना, असहमति को संभालना, आलोचना स्वीकार करना, दूसरे को सुधारात्मक सुझाव देना और अलग-अलग विचारों वाले लोगों के साथ मिलकर काम करना शामिल है।

एक बेहद कुशल सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ यदि अपनी समस्या अपनी टीम को समझा नहीं सकता, तो उसकी तकनीकी योग्यता का कार्यस्थल पर पूरा उपयोग नहीं हो सकता।

इसी तरह एक बेहद अच्छा वक्ता यदि आंकड़ों की विश्वसनीयता, डिजिटल सुरक्षा या एआई से उत्पन्न जानकारी की सीमाओं को नहीं समझता, तो उसकी निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो जाती है।

यहां सवाल यही है कि क्या शिक्षा तकनीकी कौशल और मानवीय कौशल दोनों को जोड़ रही है?

मानविकी और प्रौद्योगिकी के बीच की दूरी कम करनी होगी। आज मानविकी और तकनीक को एक-दूसरे के विरोधी क्षेत्र समझना पुरानी सोच है।

एआई तैयार करने के लिए गणित और कंप्यूटर विज्ञान की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके उपयोग से जुड़े नैतिक, कानूनी, सामाजिक और मानवीय सवालों को समझने के लिए दर्शन, मनोविज्ञान, समाज विज्ञान और कानून की भी आवश्यकता है।

इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में आधुनिक तकनीक महत्वपूर्ण है, लेकिन मरीज के प्रति सहानुभूति और प्रभावी व्यवहार के बिना तकनीक मानवीय सेवा को पूरा नहीं कर सकती।

डिजिटल अर्थव्यवस्था में भी तकनीकी योग्यता के साथ समस्या समाधान, रचनात्मक सोच, बातचीत, सहयोग, भावनात्मक समझ और लगातार सीखते रहने की क्षमता की आवश्यकता होती है।

भविष्य की शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण विचार ‘टी-आकार की पेशेवर योग्यता’ हो सकता है—गहराई भी, व्यापकता भी।

इसमें ‘टी’ की ऊपर की ओर जाने वाली रेखा व्यक्ति की अपने विषय में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है, जैसे इंजीनियरिंग, चिकित्सा, पत्रकारिता, कानून या कृषि।

इसकी बाएं से दाएं जाने वाली रेखा व्यापक समझ को दर्शाती है—डिजिटल ज्ञान, संवाद, तार्किक सोच, आंकड़ों की समझ, टीम वर्क, व्यवहार और बदलाव के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता।

इस मॉडल का उद्देश्य किसी इंजीनियर को दार्शनिक या किसी मानविकी के विद्यार्थी को इंजीनियर बनाना नहीं है।

मकसद यह है कि हर व्यक्ति अपने विषय में विशेषज्ञ होने के साथ-साथ दूसरे क्षेत्रों की बुनियादी भाषा समझ सके।

सबसे पहले तकनीकी पढ़ाई में संवाद को औपचारिक रूप से शामिल किया जाए। प्रभावी बोलचाल, तकनीकी लेखन, ध्यान से सुनना, टीम में काम करना, असहमति को संभालना और पेशेवर व्यवहार की भी जांच हो।

दूसरी ओर मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए आंकड़ों की समझ, आंकड़ा विश्लेषण, डिजिटल शोध, एआई की बुनियादी जानकारी, साइबर सुरक्षा और कंप्यूटरी तर्क को शुरुआती पढ़ाई का हिस्सा बनाया जा सकता है।

तीसरा कदम अंतर-विषयक आधारित शिक्षा हो। इंजीनियरिंग के विद्यार्थी तकनीकी मॉडल तैयार करें और मानविकी के विद्यार्थी उसके सामाजिक प्रभाव, व्यवहारिक पक्ष, ग्राहक के अनुभव और संचार पक्ष का अध्ययन करें।

चौथा—सिर्फ डिग्री को रोजगार की योग्यता का मापदंड न बनाया जाए। विद्यार्थी ने वास्तव में क्या बनाया, कौन-सी समस्या हल की, टीम में कैसे काम किया और अपनी शिक्षा को व्यवहार में कैसे लागू किया—यह भी महत्वपूर्ण हो।

पांचवां—शिक्षा को डिग्री मिलने के साथ समाप्त होने वाली प्रक्रिया न माना जाए। बदलती तकनीक के युग में पुनः-कौशल विकास, कौशल-वृद्धि और जीवन भर सीखने की प्रक्रिया जरूरी होगी।

भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह केवल व्यक्तिगत रोजगार का मुद्दा नहीं है। यह अधिक और बेहतर काम, नई सोच, नए आविष्कार, अर्थव्यवस्था की तेज और सक्रिय गति तथा सामाजिक प्रगति से जुड़ा सवाल है।

यदि शिक्षा व्यवस्था एक ओर डिग्रीधारी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाती रहे और दूसरी ओर उद्योगों में बदलती जरूरतों के साथ पाठ्यक्रम का संबंध कमजोर रहे, तो डिग्रियां और नौकरियां दोनों मौजूद होने के बावजूद उनके बीच मेल की कमी बनी रहेगी।

इसलिए भारत को ‘डिग्री आधारित अर्थव्यवस्था’ से ‘कौशल आधारित अर्थव्यवस्था’ की ओर बढ़ना होगा।

लेकिन कौशल आधारित अर्थव्यवस्था का मतलब केवल कोडिंग, मशीनों या तकनीकी प्रशिक्षण से नहीं है।

इसमें मानवीय कौशल भी बराबर महत्वपूर्ण हैं। असली अंतर तकनीकी और गैर-तकनीकी के बीच नहीं, बल्कि तकनीकी और गैर-तकनीकी की पुरानी विभाजन रेखा तेजी से अर्थहीन होती जा रही है।

आज के युग में, एआई के दौर में मशीन का तर्क और मानवीय समझ एक साथ काम करेंगे। आंकड़ों के युग में केवल आंकड़े पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। उनके पीछे छिपे सामाजिक अर्थ को समझना भी जरूरी होगा।

स्वचालित प्रणाली काम को कम कर सकती है, लेकिन सहानुभूति, व्यावहारिक निर्णय, सहयोग, रचनात्मकता और जटिल समस्याओं को हल करने की मानवीय क्षमता की आवश्यकता समाप्त नहीं होगी।

इसलिए आज शिक्षा का सबसे बड़ा सवाल यह है कि विद्यार्थी जो जानता है, उसे वह तकनीक से कैसे जोड़ता है, लोगों के साथ कैसे साझा करता है, समस्याओं को कैसे हल करता है और बदलती दुनिया में कितनी तेजी से नया सीख सकता है?

भविष्य केवल उस व्यक्ति का नहीं होगा जो मशीन की भाषा जानता है, न ही केवल उसका जो इंसान की भाषा समझता है।

भविष्य उस पेशेवर का होगा जो मशीन की भाषा भी समझता हो और इंसान की भाषा भी।

यही आज की शिक्षा की अगली दिशा है—ज्ञान को खानों में बांटने के बजाय उसे जोड़ना, तकनीकी विशेषज्ञता को मानवीय समझ के साथ मिलाना और केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि बदलती दुनिया के लिए सक्षम इंसान तैयार करना।

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 21193)

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