Wednesday, November 4, 2026
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डिजिटल जकड़ पर अमरीकी पकड़, दुनिया बेख्बर

18 अरब डॉलर…! यह रकम सुनकर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, विकास और लोगों की किस्मत बदलने के सपने मन में उभरने लगते हैं। लेकिन जब दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों को बच्चों की सुरक्षा के सवाल पर अदालतों और सरकारों के सामने जवाबदेह होना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि मामला केवल पैसे का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है।

अगस्त 2026 में अमेरिका के 47 राज्यों और अन्य अधिकार क्षेत्रों के साथ हुए समझौते के तहत मेटा ने बच्चों और वयस्कों की सुरक्षा से जुड़े मुकदमों के निपटारे के लिए अरबों डॉलर का भुगतान करने और अपने प्लेटफॉर्मों में बदलाव करने पर सहमति जताई। यह समझौता फेसबुक और इंस्टाग्राम की कार्यप्रणाली से जुड़े आरोपों के संबंध में था। मेटा ने गलत काम करने के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। इसलिए इसे केवल जुर्माना कहने के बजाय कानूनी समझौता कहना अधिक उचित होगा।

आरोप थे कि सोशल मीडिया के कुछ डिजाइन और सिफारिशी तरीके युवाओं को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म से जोड़े रखते हैं और इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है। दावों में बच्चों की निजी जानकारी के इस्तेमाल और प्लेटफॉर्म की सुरक्षा के बारे में लोगों को गुमराह करने के आरोप भी शामिल थे। इन्हीं आरोपों को लेकर कानूनी कार्रवाई की गई।

आज कोई बच्चा मोबाइल खोलता है, तो एक वीडियो के बाद दूसरा और एक रील के बाद अगली रील उसके सामने आने लगती है। कई बार वह अपनी मर्जी से देखना शुरू करता है, लेकिन कब घंटे बीत जाते हैं, उसे पता ही नहीं चलता। पढ़ाई, खेलकूद, नींद, परिवार के साथ बातचीत और शारीरिक गतिविधियां पीछे छूट सकती हैं। हर बच्चे पर इसका एक जैसा असर नहीं पड़ता, लेकिन लगातार और अनियंत्रित इस्तेमाल के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

उम्र के अनुसार सामग्री दिखाना, नाबालिगों के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, रात के समय इस्तेमाल पर रोक लगाने के विकल्प, माता-पिता के लिए प्रभावी नियंत्रण और अनावश्यक सूचनाओं को कम करना—ये कदम बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा में सहायक हो सकते हैं। अमेरिका में हुए समझौते में भी किशोरों के इस्तेमाल और उनकी सुरक्षा से जुड़े कई उपाय शामिल हैं।

भारत में भी केंद्र और राज्य सरकारों, शिक्षण संस्थानों, बाल अधिकार संगठनों तथा तकनीकी कंपनियों को मिलकर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। बच्चों की उम्र के अनुसार सामग्री तक पहुंच, निजता की सुरक्षा, माता-पिता की सहमति, लत जैसी आदत पैदा करने वाले डिजाइन की जांच और शिकायतों के त्वरित निपटारे के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। केवल दो घंटे की सीमा तय कर देना हर समस्या का समाधान नहीं है। डिजिटल शिक्षा और तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी उतना ही जरूरी है।

माता-पिता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बच्चों से बातचीत करना, खेलकूद और किताबों के लिए समय निकालना, सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाए रखना और घर में इस्तेमाल के स्पष्ट नियम तय करना—ये छोटे-छोटे कदम बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

आज समय रहते यह समझ लेना जरूरी है कि देश केवल सीमाओं, इमारतों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनते, बल्कि उन लोगों से बनते हैं जो उनमें रहते हैं। यदि बच्चों का बचपन ही अनियंत्रित डिजिटल दुनिया की भेंट चढ़ जाए, तो तरक्की के तमाम दावे अधूरे रह जाएंगे।

तकनीक बच्चों के भविष्य को रोशन करने का साधन बने, न कि उनके ध्यान, समय और मानसिक शांति को छीनने का जरिया। आने वाली पीढ़ी की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है। इसके लिए जागरूकता और सामूहिक प्रयास बेहद जरूरी हैं।

छत्रपाल सिंह

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