स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा के नेतृत्व में राज्य स्तरीय मां-नवजात शिशु देखभाल पहल शुरू; मां और बच्चे के बीच त्वचा से त्वचा का संपर्क, स्तनपान और नवजात के इलाज में माता-पिता की भागीदारी को मिलेगा प्रोत्साहन
हरियाणा , 5 नवंबर 2026 (संजीव शर्मा): गंभीर रूप से बीमार नवजात बच्चों की जान बचाने की तैयारियों को और मजबूत करते हुए हरियाणा सरकार प्रदेश में लगभग 7 करोड़ रुपये की लागत से 19 अतिरिक्त नवजात वेंटिलेटर उपलब्ध करवाने जा रही है। प्रदेश की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों (एसएनसीयू) में पहले से ही 54 नवजात वेंटिलेटर उपलब्ध हैं। इन 19 नए वेंटिलेटरों के शामिल होने से गंभीर परिस्थितियों में नवजात बच्चों को समय पर सांस लेने में सहायता प्रदान करने की क्षमता और मजबूत होगी।
इसके साथ ही हरियाणा सरकार विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों को एकीकृत मां-नवजात शिशु देखभाल इकाइयों (एमएनसीयू) के रूप में विकसित करने के लिए राज्य स्तरीय पहल कर रही है। इसके तहत चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त परिस्थितियों में अस्पताल में इलाज के दौरान मां को अपने नवजात बच्चे के साथ रहने की सुविधा दी जाएगी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा ने बुधवार को यह जानकारी दी।
इस पहल का उद्देश्य अस्पताल में भर्ती नवजात बच्चों को उनकी माताओं से अनावश्यक रूप से अलग होने से बचाना है। इसके लिए विशेष चिकित्सा उपचार के साथ-साथ मां की निरंतर मौजूदगी, स्तनपान में सहयोग और बच्चे की देखभाल में परिवार की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
नई व्यवस्था के तहत माताओं को अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान अपने बच्चों के पास रहने और प्रशिक्षित डॉक्टरों तथा नर्सों की देखरेख में उनकी देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, यह पहल विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ‘जीरो सेपरेशन’ यानी मां और नवजात बच्चे को अलग न करने के सिद्धांत पर आधारित है। इस सिद्धांत के तहत चिकित्सकीय रूप से संभव होने पर विशेष नवजात शिशु देखभाल की आवश्यकता वाले मामलों में भी मां और बच्चे को एक साथ रखने पर जोर दिया जाता है।
यह मॉडल विशेष रूप से समय से पहले जन्मे और कम वजन वाले बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रखने, दूध पिलाने में सहायता, शरीर का तापमान नियंत्रित रखने और लगातार चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता हो सकती है।
नवजात बच्चे की देखभाल में सक्रिय भागीदार बनेंगी माताएं
मां-नवजात शिशु देखभाल इकाई (एमएनसीयू) की प्रमुख विशेषताओं में कंगारू मदर केयर (केएमसी) शामिल है। इसमें नवजात बच्चे को मां या किसी अन्य उपयुक्त देखभालकर्ता की छाती से सीधे त्वचा के संपर्क में रखा जाता है।
यह प्रक्रिया बच्चे के शरीर का तापमान बनाए रखने, स्तनपान को प्रोत्साहित करने और मां तथा बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत करने में मदद करती है। यह विशेष रूप से समय से पहले जन्मे और कम वजन वाले बच्चों के लिए लाभदायक है।
इस एकीकृत देखभाल मॉडल के तहत स्वास्थ्य विशेषज्ञ माताओं को स्तनपान, नवजात बच्चे के पोषण, स्वच्छता और बीमारी के चेतावनी संकेतों की पहचान करने के संबंध में भी मार्गदर्शन देंगे।
विभाग के अनुसार, मां की निरंतर मौजूदगी से माताओं में अपने बच्चों की देखभाल को लेकर आत्मविश्वास बढ़ेगा और अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान अनावश्यक अलगाव के कारण होने वाली मानसिक परेशानी भी कम होगी। आवश्यकता और उपयुक्तता के अनुसार परिवार के अन्य सदस्य भी स्वास्थ्य कर्मचारियों की निगरानी में बच्चे की दैनिक देखभाल में हिस्सा ले सकेंगे।
अंबाला और कुरुक्षेत्र बने राज्य स्तरीय विस्तार के लिए मॉडल
राज्य स्तरीय पहल की शुरुआत अंबाला शहर और कुरुक्षेत्र के जिला अस्पतालों में स्थापित मां-नवजात शिशु देखभाल सुविधाओं से प्राप्त शोध और व्यावहारिक अनुभव के आधार पर की जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सोसाइटी फॉर एप्लाइड स्टडीज और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हरियाणा सरकार के सहयोग से अंबाला शहर के जिला अस्पताल में इमीडिएट कंगारू मदर केयर से संबंधित एक कार्यान्वयन अनुसंधान अध्ययन शुरू किया था।
इस शोध के तहत अंबाला शहर के लेवल-2 स्वास्थ्य सुविधा वाले जिला अस्पताल में देश की पहली जिला स्तरीय मां-नवजात शिशु देखभाल इकाई स्थापित की गई। इस पहल ने यह दर्शाया कि विशेष नवजात बच्चों के चिकित्सकीय उपचार के साथ मां की निरंतर मौजूदगी को किस प्रकार एकीकृत किया जा सकता है।
अंबाला की पहल के बाद कुरुक्षेत्र जिला अस्पताल में भी एक मां-नवजात शिशु देखभाल इकाई स्थापित की गई, जो बाद में राज्य स्तरीय कार्यक्रम के लिए मॉडल सुविधा बनी।
हरियाणा के विभिन्न जिलों के स्वास्थ्य अधिकारियों ने कुरुक्षेत्र स्थित इस इकाई का दौरा करके वहां उपलब्ध बुनियादी ढांचे, चिकित्सा उपकरणों, संक्रमण नियंत्रण उपायों, स्टाफ की व्यवस्था और चिकित्सा प्रक्रियाओं का अध्ययन किया, ताकि अपने-अपने जिलों में भी इसी प्रकार की सुविधाएं स्थापित की जा सकें।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, हरियाणा ने सोसाइटी फॉर एप्लाइड स्टडीज के समन्वय से ये ओरिएंटेशन दौरे करवाए, ताकि जिला स्वास्थ्य टीमें इस पहल के विस्तार के लिए आवश्यक तैयारियां कर सकें।
विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों को अपग्रेड करने की राज्य स्तरीय योजना
डॉ. सुमिता मिश्रा ने 21 अगस्त को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की कार्यकारी समिति की बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि हरियाणा की सभी विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों को 1 नवंबर, 2026 तक मां-नवजात शिशु देखभाल इकाइयों के रूप में स्थापित या अपग्रेड किया जाए।
ये निर्देश अस्पतालों में नवजात बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और मौजूदा चिकित्सा सुविधाओं में परिवार-केंद्रित देखभाल को शामिल करने की राज्य सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
अगस्त में मां और बच्चे की स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा के दौरान जारी आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में कुल 29 विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयां संचालित थीं।
हालांकि, बुधवार को जारी की गई जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इनमें से कितनी इकाइयां पूरी तरह मां-नवजात शिशु देखभाल मॉडल में परिवर्तित हो चुकी हैं।
विभाग के अनुसार, इस पहल के विस्तार के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, जिला स्वास्थ्य प्राधिकरणों और सोसाइटी फॉर एप्लाइड स्टडीज के बीच समन्वय स्थापित किया जा रहा है।
मां की मौजूदगी के साथ जारी रहेगा विशेष चिकित्सा उपचार
स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया कि मां-नवजात शिशु देखभाल मॉडल में मां की भागीदारी को उचित चिकित्सकीय जांच, निगरानी और उपचार के साथ एकीकृत किया जाएगा।
नवजात बच्चे की चिकित्सकीय स्थिति और स्वास्थ्य केंद्र की सुविधाओं के अनुसार उपचार में ऑक्सीजन सपोर्ट, कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (सीपीएपी) सहायता, पीलिया के उपचार के लिए फोटोथेरेपी, दूध पिलाने में सहायता और निर्धारित दवाएं शामिल हो सकती हैं।
जिन बच्चों को अधिक उन्नत चिकित्सा सुविधाओं की आवश्यकता होगी, उन्हें चिकित्सकीय जरूरत के अनुसार उच्च स्तरीय स्वास्थ्य संस्थानों में रेफर किया जाता रहेगा।
विभाग ने कहा कि इस कार्यक्रम में संक्रमण की रोकथाम को विशेष महत्व दिया जाएगा। इसके लिए हाथों की स्वच्छता, अस्पताल परिसर की नियमित सफाई, उपकरणों को संक्रमण मुक्त करना, बायोमेडिकल कचरे का प्रबंधन और विशेष देखभाल इकाइयों में आवाजाही संबंधी निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा।
अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले परिवारों को दिया जाएगा मार्गदर्शन
इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माता-पिता को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद घर पर नवजात बच्चे की बेहतर देखभाल के लिए तैयार करना भी है। माताओं और अन्य योग्य देखभालकर्ताओं को स्तनपान, कंगारू मदर केयर, नवजात बच्चे की स्वच्छता, चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता वाले चेतावनी संकेतों और नियमित फॉलोअप के संबंध में जानकारी दी जाएगी।
विभाग के अनुसार, उपचार की उपयुक्त प्रक्रियाओं में माताओं की भागीदारी से परिवार बच्चे की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी सुझाई गई देखभाल जारी रखने के लिए तैयार होंगे।
एमएनसीयू मॉडल का उद्देश्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना, चिकित्सकीय प्रक्रियाओं को मानकीकृत करना और मौजूदा सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में नवजात बच्चों की देखभाल की व्यवस्था को और प्रभावी बनाना भी है।
यह राज्य स्तरीय पहल मां और नवजात बच्चे दोनों की जरूरतों के प्रति स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संवेदनशील बनाने के साथ-साथ चिकित्सा सुरक्षा और उचित निगरानी सुनिश्चित करने की दिशा में हरियाणा सरकार के प्रयासों को दर्शाती है।
डॉ. मिश्रा ने कहा कि विशेष चिकित्सा उपचार के साथ मां की मौजूदगी और परिवार की भागीदारी को जोड़कर इस कार्यक्रम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कमजोर और गंभीर रूप से बीमार नवजात बच्चों को स्वस्थ होने के दौरान चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ अपनी मां का प्यार, सुरक्षा और सहयोग भी मिल सके।






