Tuesday, September 29, 2026
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अनदेखे फरिश्तों को दें सम्मान, जो आगे बढ़कर बचाते हैं जान

जब बाढ़ आती है, तूफान टकराता है, जंगलों में आग लगती है या बेहिसाब गर्मी लोगों की जिंदगी ठप कर देती है, तो हमारी नजर आमतौर पर तबाही, मौतों, राहत शिविरों और सरकारी घोषणाओं पर जाती है। लेकिन इस पूरे संकट के पीछे कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनकी मेहनत अक्सर खबर नहीं बनती—स्वास्थ्य कर्मचारी, आशा वर्कर, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सफाई कर्मचारी, बिजली और पानी के कर्मचारी, पुलिस, फायरफाइटर, ड्राइवर, एंबुलेंस स्टाफ, दिहाड़ी मजदूर, राहत सामग्री बांटने वाले स्वयंसेवक और स्थानीय समुदाय के सदस्य।

यही हैं जलवायु आपदाओं के फ्रंटलाइन वर्कर—जो दूसरों को सुरक्षित करने के लिए खुद खतरे में प्रवेश करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन  के मुताबिक जलवायु परिवर्तन ने कामकाजी लोगों के लिए अत्यधिक गर्मी, अल्ट्रावायलेट किरणों, बाढ़ और अन्य चरम मौसम की घटनाओं, वायु प्रदूषण, वेक्टर जनित बीमारियों और कृषि रसायनों जैसे खतरों को बढ़ाया है।

आपदा की तस्वीर में हम अक्सर बचाव अभियान देखते हैं, लेकिन असली काम इससे कहीं ज्यादा लंबा होता है। बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद गंदगी हटाना, पीने के पानी को सुरक्षित बनाना, बीमारियों को रोकना, बिजली बहाल करना, टूटी सड़कों और इमारतों की जांच करना, मृतकों की पहचान करना और बेघर परिवारों का पुनर्वास करना—यह पूरा काम किसी न किसी कर्मचारी के कंधों पर होता है।

इसलिए आपदा प्रबंधन सिर्फ राहत नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली पुनर्वास और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है।

किसी बाढ़ या गर्मी की लहर के दौरान स्वास्थ्य कर्मचारी सिर्फ मरीजों का इलाज नहीं करते। वे बीमारियों की निगरानी, टीकाकरण, दवाइयों का वितरण, गर्भवती महिलाओं और बच्चों की देखभाल तथा स्वास्थ्य जागरूकता का काम भी करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, आपातकालीन प्रतिक्रिया देने वाले कर्मचारियों को शारीरिक खतरे के साथ-साथ तनाव, डर और मानसिक दबाव का भी सामना करना पड़ता है। इसलिए आपदा प्रबंधन में कर्मचारियों के स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।

आपदा के समय महिलाओं की भूमिका और भी जटिल हो जाती है। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से लेकर घरों में बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों और दिव्यांगों की देखभाल करने वाली महिलाओं तक—एक बड़ा हिस्सा ऐसे काम का है, जिसकी अक्सर कोई तनख्वाह या आधिकारिक गणना नहीं होती।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में महिलाएं लगभग 76 प्रतिशत बिना वेतन वाले केयर वर्क का काम करती हैं और वैश्विक भुगतान वाली स्वास्थ्य एवं केयर वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 67 प्रतिशत है।

भारत में भी संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने आपदा प्रबंधन में आशा वर्करों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, महिला स्वयंसेवकों और पंचायती प्रतिनिधियों की भूमिका को दस्तावेजबद्ध किया है।

इसलिए आपदा के समय ‘केयर वर्क’ को भी वास्तविक आपदा प्रतिक्रिया का हिस्सा मानना होगा।

हम अक्सर आपदा का अर्थ सिर्फ बाढ़ या तूफान लेते हैं। लेकिन बढ़ती गर्मी भी मजदूरों के लिए गंभीर खतरा है। खेतों में काम करने वाले किसान-मजदूर, निर्माण मजदूर, सड़क कर्मचारी, डिलीवरी वर्कर, रिक्शा चालक और बाहर काम करने वाले अन्य लोग गर्मी के सीधे संपर्क में रहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, दुनियाभर में 2.4 अरब से अधिक मजदूर अत्यधिक गर्मी के संपर्क में हैं, जो वैश्विक कामकाजी आबादी के 70 प्रतिशत से अधिक के बराबर है। गर्मी से हीट एग्जॉशन और हीटस्ट्रोक के अलावा दिल, सांस और गुर्दों से संबंधित लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।

इसलिए ‘गर्मी में काम करना तो पड़ता ही है’ वाली सोच अब सुरक्षा नीति का विकल्प नहीं हो सकती।

आपदा का प्रभाव हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। अनौपचारिक मजदूर, प्रवासी कामगार, गरीब परिवार, ग्रामीण मजदूर और महिलाएं अक्सर कम सामाजिक सुरक्षा और कम संसाधनों के कारण ज्यादा प्रभावित होते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भी बताता है कि जलवायु संबंधी खतरों का बोझ कमजोर और अनौपचारिक मजदूरों पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है।

कई दिहाड़ी मजदूरों के लिए एक दिन काम न करने का मतलब एक दिन की आय गंवाना है। इसलिए सिर्फ यह कह देना कि “खतरनाक मौसम में काम न करें” पर्याप्त नहीं है। उन्हें आय की सुरक्षा भी देनी होगी।

2026 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सरकारी, नियोक्ता और श्रमिक विशेषज्ञों ने अत्यधिक गर्मी की मौसमी घटनाओं से जुड़े “ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ” खतरों के लिए नई अंतरराष्ट्रीय सिफारिशों पर सहमति बनाई। इनमें खतरे की वैज्ञानिक सीमा तय करना, स्वास्थ्य निगरानी, विभागों के बीच समन्वय, लैंगिक-संवेदनशील जोखिम आकलन और आपातकालीन तैयारी को मजबूत करना शामिल है।

भारत में भी जरूरत है कि आपदा प्रबंधन योजनाओं को श्रम सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जाए।

हर जिले की आपदा योजना में यह स्पष्ट होना चाहिए कि—

  • कौन से कर्मचारी सबसे ज्यादा खतरे में हैं;
  • उन्हें पीपीई, साफ पानी और आराम की सुविधा कौन उपलब्ध कराएगा;
  • अत्यधिक गर्मी में काम के घंटे कैसे बदले जाएंगे;
  • महिला और केयर वर्करों के लिए किस प्रकार की सहायता होगी;
  • घायल या बीमार फ्रंटलाइन वर्कर को मुआवजा और इलाज कैसे मिलेगा;
  • आपदा के बाद मानसिक स्वास्थ्य सहायता कहां से मिलेगी;
  • और अनौपचारिक मजदूरों की आय की सुरक्षा कैसे की जाएगी।

यहां मुद्दा यह नहीं कि वे हमें कैसे बचाते हैं, बल्कि यह है कि “हम उन्हें कैसे बचाएंगे?” यही असली सवाल है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में फ्रंटलाइन वर्कर सिर्फ “राहत कर्मी” नहीं रहे। वे जलवायु अनुकूलन और सामाजिक लचीलेपन की पहली पंक्ति हैं।

उनकी मेहनत को सिर्फ कर्तव्य कहकर खत्म नहीं किया जा सकता। उन्हें सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियां, बीमा, उचित मजदूरी, पीपीई, आराम, पीने का पानी, प्रशिक्षण, मानसिक सहायता और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत है।

आपदा के समय जो हाथ हमें बाहर निकालते हैं, वे भी किसी के अपने हैं। उन हाथों को बचाना भी आपदा प्रबंधन का ही हिस्सा है।

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 211193)

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