हम उस दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ इंसान के पास संपर्क के साधन पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन सच्चे संबंधों की कमी बढ़ती जा रही है। मोबाइल में सैकड़ों संपर्क, सोशल मीडिया पर हजारों ‘दोस्त’ और हर समय ऑनलाइन रहने की सुविधा—फिर भी भीतर से अकेलापन। यही टकराव अब एक नई व्यवस्था को जन्म दे रहा है—‘लोनलीनेस इकॉनमी’, यानी अकेलेपन से पैदा हुई जरूरतों को बाजार में बदलने वाली अर्थव्यवस्था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में लगभग हर छठा व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव करता है। युवाओं में यह अनुपात लगभग पाँच में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सामाजिक अलगाव और अकेलेपन को केवल निजी या भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा माना है। इसके अनुमान के मुताबिक 2014–2019 के आंकड़ों के आधार पर अकेलेपन से जुड़ा सामाजिक अलगाव हर साल लगभग 8.71 लाख मौतों से संबंधित था।
आज AI साथी, वर्चुअल बातचीत की सेवाएं, ‘रेंट-ए-फ्रेंड’ जैसी सेवाएं, अकेले रहने वालों के लिए बनाए जा रहे विशेष आवासीय मॉडल और साझा रहने की जगहें—ये सब एक ऐसी जरूरत को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका नाम है मानवीय संगत। इसमें अपने आप में कोई बुराई नहीं है। अकेले व्यक्ति को बातचीत, सहायता या सामाजिक अवसर देने वाली सेवा कई बार उपयोगी भी हो सकती है। लेकिन खतरा तब शुरू होता है, जब रिश्ता सेवा बन जाए और सेवा सब्सक्रिप्शन।
कभी पड़ोसी बिना बुलाए दरवाजा खटखटा लेता था। दोस्त के साथ चाय पीने के लिए भी किसी ऐप की जरूरत नहीं होती थी। बुजुर्ग की खैर-खबर लेने के लिए कोई पैकेज नहीं होता था। बच्चे की परवरिश सिर्फ एक पारिवारिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी भी होती थी।
आज शहरीकरण, पलायन, अकेले रहने की बढ़ती प्रवृत्ति, डिजिटल जीवन और कमजोर होते स्थानीय सामाजिक नेटवर्क ने इस प्राकृतिक सहारे को प्रभावित किया है। WHO भी कहता है कि कमजोर सामुदायिक सुविधाएं, जैसे पार्क, सार्वजनिक परिवहन और लोगों के मिलने-जुलने की साझा जगहें, सामाजिक अलगाव और अकेलेपन को बढ़ा सकती हैं।
अगर कल किसी अकेले बुजुर्ग को बात करने के लिए ऐप की सदस्यता लेनी पड़े, किसी युवा को दोस्ती के लिए पैसे देने पड़ें और किसी परिवार को सामाजिक सहारे की जगह निजी सेवा खरीदनी पड़े—तो क्या हम एक सुविधाजनक समाज बना रहे हैं या एक महंगा अकेलापन?
तकनीक मानवीय संगत की सहायक बन सकती है; लेकिन वह इसका विकल्प नहीं बन सकती। AI बातचीत कर सकती है, लेकिन मानवीय रिश्ते की जिम्मेदारी नहीं निभा सकती। पैसे से समय खरीदा जा सकता है, लेकिन निःस्वार्थ अपनापन नहीं।
आज मुद्दा ‘लोनलीनेस इकॉनमी’ को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि बाजार मानवीय रिश्तों की जगह न ले ले।
क्योंकि जिस दिन दोस्ती पैकेज, साथ सब्सक्रिप्शन और हमदर्दी भुगतान योग्य सेवा बन गई—उस दिन हमारे पास लोग बहुत होंगे, लेकिन समाज शायद बहुत कम रह जाएगा।
छत्रपाल सिंह






