भारत और रूस के संबंध आज उस मोड़ पर हैं, जहां पुरानी “दोस्ती” अब केवल भावनात्मक रिश्ता नहीं रह गई है, बल्कि दोनों देश इसे रणनीतिक प्रभाव, आर्थिक लाभ और राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के साधन के रूप में विकसित कर रहे हैं। 11 सितंबर को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात ने इस बदलाव को और स्पष्ट किया। दोनों नेताओं ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा सहित कई मुद्दों पर चर्चा की।
तेल से आगे बढ़ने की जरूरत:
यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी कच्चे तेल की खरीद भारत-रूस आर्थिक संबंधों का सबसे बड़ा पहलू बन गई। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और करोड़ों उपभोक्ताओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रूसी तेल की खरीद जारी रखी। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। अगस्त में भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत रही, जो जुलाई के करीब 51 प्रतिशत से कम थी। रूसी यूराल्स तेल पर छूट घटने से इसकी कीमत संबंधी बढ़त भी कम हुई है। इसलिए दोनों देशों के लिए चुनौती यह है कि संबंध केवल तेल की खरीद और बिक्री तक सीमित न रहें। उद्योग, प्रौद्योगिकी, कृषि, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, परिवहन, अंतरिक्ष और महत्वपूर्ण खनिज जैसे क्षेत्र भविष्य के सहयोग का आधार बन सकते हैं।
100 अरब डॉलर का व्यापारिक लक्ष्य:
भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को लगभग 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। वित्त वर्ष 2025 में व्यापार लगभग 68.7 अरब डॉलर तक पहुंचा था, लेकिन वित्त वर्ष 2026 में यह घटकर लगभग 59.9 अरब डॉलर रह गया। इस व्यापार में रूस के पक्ष में बड़ा असंतुलन भी है, क्योंकि भारत रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा और अन्य वस्तुएं खरीदता है, जबकि भारत की रूस को निर्यात क्षमता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी है। इस अंतर को कम करना भारत के लिए अगली बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। भारतीय दवाइयां, कृषि उत्पाद, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक वस्तुएं रूसी बाजार में अपनी पहुंच बढ़ा सकती हैं।
रक्षा साझेदारी का नया चरण:
रक्षा क्षेत्र भारत-रूस संबंधों की रीढ़ रहा है। लेकिन अब भारत की जरूरत केवल तैयार हथियार खरीदने की नहीं, बल्कि संयुक्त विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और भारत में उत्पादन की है। ब्रह्मोस जैसे संयुक्त कार्यक्रम इस मॉडल की संभावनाओं को दिखाते हैं। इसके साथ ही भारत अपने रक्षा आपूर्ति स्रोतों में विविधता भी ला रहा है। इसलिए रूस को भारत के साथ अपने रक्षा संबंधों को नई तकनीक, संयुक्त उत्पादन और दीर्घकालिक आपूर्ति की विश्वसनीयता से जोड़ना होगा।
यूक्रेन युद्ध और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता:
यूक्रेन युद्ध ने भारत की विदेश नीति के सामने एक कठिन संतुलन पैदा किया है। भारत रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंध बनाए रखते हुए यूक्रेन संकट का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से करने की वकालत करता है। मोदी-पुतिन बातचीत में भी यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति सहित क्षेत्रीय मुद्दे चर्चा में रहे। यहां भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। नई दिल्ली न तो मॉस्को के हर फैसले के साथ खुद को जोड़ती है और न ही पश्चिमी दबाव के आगे अपनी नीति छोड़ती है। अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान और अन्य साझेदारों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखना भारत की बहुध्रुवीय विदेश नीति का केंद्र है।
असली ताकत: रिश्ते को लाभ में बदलना:
भारत-रूस संबंधों की अगली कसौटी यह नहीं है कि दोनों देश कितनी बार “विशेष और रणनीतिक साझेदारी” की पुष्टि करते हैं। असली कसौटी यह होगी कि यह साझेदारी निवेश, प्रौद्योगिकी, उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा क्षमता और वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव में कितना ठोस परिणाम देती है। रूस के लिए भारत एक बड़ा और बढ़ता हुआ बाजार है, जबकि भारत के लिए रूस ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक विकल्पों का महत्वपूर्ण स्रोत है। यदि दोनों देश व्यापारिक असंतुलन, भुगतान प्रणालियों, प्रौद्योगिकी सहयोग और लॉजिस्टिक बाधाओं को दूर कर लेते हैं, तो पुरानी दोस्ती एक नए प्रकार के रणनीतिक लाभ में बदल सकती है।
यही भारत-रूस संबंधों का अगला अध्याय है—लचीलेपन से प्रभाव तक और भरोसे से ठोस परिणामों तक।
छत्रपाल सिंह






