Tuesday, September 29, 2026
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क्या BRICS करेगा डॉलर की बादशाहत खत्म? या भारत रखेगा बड़ी ताकतों के कदमों में कदम?

विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिकी डॉलर के कल खत्म होने का नहीं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया धीरे-धीरे डॉलर-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था से बहु-मुद्रा और बहु-ध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन ने इस पहलू को और गंभीर बना दिया है।

BRICS देशों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने और विकासशील देशों की आर्थिक आवाज को मजबूत करने पर जोर दिया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि BRICS ने कोई नई साझा मुद्रा जारी कर दी है या डॉलर की जगह तुरंत कोई दूसरी मुद्रा ले ली है। असली तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल, धीमी और रणनीतिक है।

अमेरिकी डॉलर की ताकत केवल अमेरिका की सैन्य या राजनीतिक शक्ति के कारण नहीं है। इसके पीछे वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजारों की गहराई, अमेरिकी सरकारी ऋण बाजार की विशालता, बैंकिंग प्रणाली, विश्वसनीय भुगतान ढांचा और दशकों से बनी अंतरराष्ट्रीय आदत शामिल है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 57 प्रतिशत है। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय विदेशी मुद्रा कारोबार में भी डॉलर सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली मुद्रा है। बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के अनुसार, अप्रैल 2025 में वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में प्रतिदिन लगभग 9.6 ट्रिलियन डॉलर के लेन-देन हो रहे थे।

इसलिए डॉलर को हटाना केवल किसी दूसरी मुद्रा को आगे लाने का मामला नहीं है। इसके लिए भरोसा, तरलता, विशाल बाजार, स्थिर संस्थाएं और वैश्विक स्तर पर भुगतान ढांचे की जरूरत होगी।

BRICS की असली योजना

BRICS की मौजूदा रणनीति को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहला—स्थानीय मुद्राओं में व्यापार:

यदि भारत और रूस आपसी व्यापार में रुपये और रूबल के इस्तेमाल को बढ़ाते हैं, या भारत और अन्य BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में भुगतान करते हैं, तो हर लेन-देन के लिए डॉलर की जरूरत कम हो सकती है। इससे मुद्रा विनिमय की लागत घट सकती है और अमेरिकी वित्तीय प्रणाली पर निर्भरता भी कुछ हद तक कम हो सकती है।

लेकिन यहां एक बड़ी समस्या है—यदि भारत रूस से अधिक सामान खरीदता है और रूस को भारतीय सामान की उतनी जरूरत नहीं है, तो रूस के पास जमा हुए रुपये का क्या किया जाएगा? यही कारण है कि स्थानीय मुद्रा व्यापार के लिए केवल राजनीतिक सहमति ही नहीं, बल्कि संतुलित व्यापार, निवेश के अवसर और भुगतान की स्पष्ट व्यवस्था भी जरूरी है।

दूसरा—आपस में जुड़ी भुगतान प्रणालियां:

भारत की ताकत उसका एकीकृत भुगतान ढांचा है। भारत का एकीकृत भुगतान मंच UPI देश के भीतर तेज, सस्ते और आसान डिजिटल भुगतान की मिसाल बन चुका है। BRICS में इसी तरह की राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने की चर्चा हो रही है।

यदि भारत, ब्राजील, रूस, चीन और अन्य सदस्य देशों की भुगतान प्रणालियां आपस में जुड़ जाती हैं, तो व्यापारी और यात्री हर बार डॉलर में मुद्रा बदलने के बजाय सीधे भुगतान कर सकते हैं। लेकिन अलग-अलग मुद्राएं, विदेशी मुद्रा नियंत्रण, डेटा सुरक्षा, बैंकिंग नियम और व्यापारिक असंतुलन इस रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं।

तीसरा—डिजिटल मुद्राओं का संभावित नेटवर्क:

भारतीय रिजर्व बैंक ने BRICS देशों की केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने का विचार आगे रखा है। इसका मतलब कोई नई BRICS मुद्रा बनाना नहीं, बल्कि पहले से मौजूद राष्ट्रीय मुद्राओं के डिजिटल रूपों को आपसी लेन-देन के योग्य बनाना है।

यह व्यवस्था भविष्य में सीमा-पार व्यापार, पर्यटन और छोटे कारोबारों के लिए लाभदायक हो सकती है। लेकिन यह अभी तकनीकी और नीतिगत विचार-विमर्श के चरण में है। इसे पूरी तरह संचालित होने वाली वैश्विक प्रणाली मानना अभी जल्दबाजी होगी।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल

क्या चीन कोई जाल बुन रहा है?

डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश अपने आप में भारत के हित में हो सकती है, लेकिन यदि इसकी जगह चीनी युआन या चीन-केंद्रित वित्तीय ढांचा हावी हो जाता है, तो भारत एक निर्भरता से निकलकर दूसरी निर्भरता में फंस सकता है।

चीन की अर्थव्यवस्था BRICS में सबसे बड़ी है। उसके पास बड़े औद्योगिक पैमाने, विशाल निर्यात क्षमता, तकनीकी ढांचा और वित्तीय संसाधन हैं। इसलिए BRICS के व्यापार और भुगतान ढांचे में चीन का प्रभाव स्वाभाविक रूप से अधिक हो सकता है।

लेकिन भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि BRICS किसी एक देश के नेतृत्व में चलने वाला वित्तीय गठबंधन न बने। भारत के लिए BRICS का अर्थ होना चाहिए—बहुपक्षीय सहयोग, न कि चीन-केंद्रित नया वित्तीय साम्राज्य।

भारत की नीति क्या होनी चाहिए?

  • किसी एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता नहीं।
  • किसी एक देश की भुगतान व्यवस्था पर पूरा भरोसा नहीं।
  • सभी सदस्यों के लिए समान नियम।
  • डेटा, सुरक्षा और वित्तीय स्वायत्तता की रक्षा।
  • रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाना।
  • व्यापारिक संतुलन और निवेश के अवसरों को मजबूत करना।

भारत BRICS को केवल पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के मंच के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। भारत को इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को अवसर बनाना चाहिए।

रुपये की अंतरराष्ट्रीय भूमिका

यदि भारतीय कंपनियां, विदेशी व्यापारी और BRICS देश रुपये में व्यापार बढ़ाते हैं, तो रुपये की वैश्विक मांग बढ़ सकती है। इससे भारतीय मुद्रा को अधिक अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता मिल सकती है।

भारतीय डिजिटल ढांचे का विस्तार

UPI जैसा भुगतान ढांचा भारत की तकनीकी ताकत है। यदि इसे BRICS देशों में सुरक्षित और नियमनबद्ध तरीके से फैलाया जाता है, तो भारत केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि डिजिटल वित्तीय ढांचे का भी निर्यातक बन सकता है।

छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए लाभ

सीमा-पार भुगतान सस्ते और तेज होने से छोटे व्यापारी, निर्यातक, सेवा प्रदाता और नए उद्यम वैश्विक बाजार से अधिक आसानी से जुड़ सकते हैं।

आर्थिक प्रतिबंधों से बचाव

जब किसी देश पर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो उसका व्यापार और भुगतान प्रभावित होता है। वैकल्पिक भुगतान मार्ग कुछ हद तक व्यापारिक लचीलापन दे सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रतिबंध अपने आप खत्म हो जाएंगे या हर तरह का वित्तीय जोखिम दूर हो जाएगा।

BRICS के अंदरूनी मतभेद भी कम नहीं

BRICS को एकजुट राजनीतिक या आर्थिक गठबंधन मानना उचित नहीं होगा। इसके सदस्यों के हित कई मामलों में अलग-अलग हैं।

भारत और चीन के बीच सीमा और रणनीतिक तनाव है। रूस की अपनी सुरक्षा और प्रतिबंध संबंधी चिंताएं हैं। ब्राजील की प्राथमिकताएं अलग हैं। मध्य-पूर्वी सदस्यों के क्षेत्रीय हित भी अलग-अलग हैं। कुछ देश BRICS को पश्चिमी प्रभाव के संतुलन के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ इसे केवल आर्थिक सहयोग का मंच बनाए रखना चाहते हैं।

इसलिए साझा मुद्रा बनाना बेहद मुश्किल है। साझा मुद्रा के लिए साझा केंद्रीय बैंक, साझा वित्तीय नीति, मुद्रा स्थिरता, व्यापारिक अनुशासन और सदस्य देशों के बीच उच्च स्तर के भरोसे की आवश्यकता होगी। BRICS में फिलहाल ये सभी शर्तें मौजूद नहीं हैं।

क्या डॉलर का अंत नजदीक है?

लंबे समय में डॉलर की हिस्सेदारी में कमी आ सकती है। कुछ देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को विभिन्न मुद्राओं में रखना चाहते हैं। कुछ देश डॉलर के इस्तेमाल को राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में देखते हैं। लेकिन डॉलर की जगह लेने के लिए किसी अन्य मुद्रा या गठबंधन के पास अभी उसी स्तर की विश्वसनीयता, तरलता और वैश्विक स्वीकार्यता मौजूद नहीं है।

इसलिए BRICS की वास्तविक दिशा “डॉलर का तत्काल अंत” नहीं, बल्कि “डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता में कमी लाना” है।

यह एक धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें स्थानीय मुद्राएं, डिजिटल भुगतान, क्षेत्रीय आर्थिक संस्थाएं और बहु-मुद्रा व्यापार अपनी भूमिका निभाएंगे।

भारत को कौन-सा रास्ता चुनना चाहिए?

भारत को न तो डॉलर-विरोधी अभियान का अंधा हिस्सा बनना चाहिए और न ही चीन-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था का सहयोगी बनना चाहिए। भारत का रास्ता रणनीतिक स्वायत्तता का होना चाहिए।

भारत को अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ—सभी के साथ व्यापारिक और वित्तीय संबंध रखते हुए अपने विकल्प बढ़ाने चाहिए। किसी एक धुरी से पूरी तरह जुड़ने के बजाय भारत को कई वित्तीय और व्यापारिक रास्ते खुले रखने चाहिए।

भारत की भूमिका BRICS में किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के लिए होनी चाहिए।

और BRICS किसी एक मुद्रा की जगह दूसरी मुद्रा की बादशाहत स्थापित करने के बजाय कई मुद्राओं की संतुलित भूमिका बनाए।

BRICS वित्तीय निर्भरता नहीं, बल्कि आर्थिक विकल्प पैदा करे।

BRICS भले ही डॉलर की बादशाहत को एक झटके में खत्म नहीं कर सकता, लेकिन यह डॉलर-केंद्रित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के एकछत्र प्रभाव को चुनौती दे सकता है। इसकी ताकत किसी नई साझा मुद्रा में नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्राओं, आपसी भुगतान प्रणालियों, डिजिटल तकनीक और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज में है।

भारत के लिए यह अवसर भी है और परीक्षा भी। अवसर इसलिए कि रुपये, भारतीय तकनीक और भारतीय व्यापार को वैश्विक स्तर पर बढ़ाया जा सकता है। परीक्षा इसलिए कि चीन के बढ़ते प्रभाव, BRICS के अंदरूनी मतभेदों और आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत को अपनी स्वायत्तता बनाए रखनी होगी।

असल बदलाव उस दिन नहीं होगा जब कोई नई BRICS मुद्रा जारी होगी। असल बदलाव उस समय होगा जब दुनिया के देशों के पास व्यापार और भुगतान के लिए एक से अधिक भरोसेमंद रास्ते होंगे।

अब मुद्दा BRICS में डॉलर को खत्म करने का नहीं, बल्कि BRICS के माध्यम से दुनिया को एक नया आर्थिक विकल्प देने का है।

“क्या भारत उस विकल्प का निर्माता बनेगा या सिर्फ किसी दूसरी शक्ति के पीछे चलेगा?”

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 21193)

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