भारत की कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी, गांवों की अर्थव्यवस्था और देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। लेकिन आज किसान जिस संकट से गुजर रहा है, उसकी जड़ केवल फसल की कम कीमत या कर्ज में नहीं है। यह संकट बढ़ती लागत, छोटी और बिखरी हुई जोतों, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण, बाजार की अनिश्चितता, कर्ज और सामाजिक-मानसिक दबाव का संयुक्त परिणाम है।
भारत के 77वें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, 2018-19 में एक कृषि परिवार की औसत मासिक आय ₹10,218 थी। इसमें केवल फसल से होने वाली आय ही नहीं, बल्कि मजदूरी, पशुपालन, गैर-कृषि व्यवसाय और जमीन के किराए से होने वाली आय भी शामिल थी। इसी सर्वेक्षण में 50.2% कृषि परिवार कर्ज के बोझ तले पाए गए और प्रत्येक कर्जदार कृषि परिवार पर औसतन ₹74,121 का बकाया कर्ज था।
सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को अपनी उत्पादन लागत, मौसम, कीटों और बाजार—इन चारों जोखिमों का सामना करना पड़ता है, उसकी आय कितनी स्थिर हो सकती है? छोटी और बिखरी हुई जोतें इस समस्या को और गंभीर बना देती हैं। कृषि जनगणना में एक हेक्टेयर से कम भूमि वाली जोत को सीमांत और 1–2 हेक्टेयर वाली जोत को छोटी जोत माना जाता है।
दूसरा बड़ा संकट मिट्टी और पानी का है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का आवश्यकता से अधिक या असंतुलित इस्तेमाल, एकल-फसल प्रणाली और जैविक पदार्थों की कमी मिट्टी की दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता को प्रभावित कर सकती है। पंजाब इसका गंभीर उदाहरण है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में वार्षिक पुनर्भरण योग्य भूजल संसाधन 17.63 बिलियन घन मीटर के मुकाबले वार्षिक भूजल निकासी 27.66 बिलियन घन मीटर थी—अर्थात भूजल दोहन का स्तर 156.87% था। 153 मूल्यांकन इकाइयों में से 115, यानी 75.16%, ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणी में थीं।
इसका मतलब है कि हम आज की पैदावार के लिए कल का पानी खर्च कर रहे हैं। यदि कृषि प्रणाली किसान की आय के साथ-साथ मिट्टी की सेहत और पानी की स्थिरता को भी नहीं बचाती, तो यह मॉडल लंबे समय में किसान और समाज—दोनों के लिए महंगा साबित होगा।
सबसे दर्दनाक पहलू मानसिक स्वास्थ्य है। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,786 लोगों ने आत्महत्या की—इनमें 4,690 किसान/काश्तकार और 6,096 कृषि मजदूर शामिल थे। यह कुल आत्महत्याओं का 6.3% था। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं; ये कर्ज, फसल के नुकसान, आय की अनिश्चितता, पारिवारिक जिम्मेदारियों और भविष्य को लेकर भय के मिले-जुले दबाव की ओर संकेत करते हैं। हालांकि आत्महत्या का कोई एक कारण नहीं होता और एनसीआरबी के वर्गीकरण को कृषि संकट का पूर्ण मापदंड नहीं माना जा सकता।
इसलिए समाधान भी किसी एक योजना से नहीं निकलेगा। न्यायसंगत और पारदर्शी फसल मूल्य, लागत आधारित आय सुरक्षा, सस्ता संस्थागत ऋण, प्रभावी फसल बीमा, पानी बचाने वाली खेती, मिट्टी की सेहत, फसल विविधीकरण, भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधाएं तथा गांव स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को एक ही नीति-ढांचे का हिस्सा बनाना होगा।
किसान को केवल ‘अन्नदाता’ कह देना पर्याप्त नहीं है। उसे अपनी उपज की सम्मानजनक कीमत, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, वित्तीय सुरक्षा और संकट के समय मानवीय सहारा भी मिलना चाहिए।
कृषि की वास्तविक प्रगति केवल यह नहीं है कि खेत में कितने क्विंटल अनाज पैदा हुआ; असली माप यह है कि किसान ने उस उत्पादन से कितनी टिकाऊ आय अर्जित की, मिट्टी ने क्या खोया, पानी कितना बचा और किसान का परिवार कितनी सुरक्षित जिंदगी जी सका।
यदि हम इस मूल सत्य को नहीं समझते, तो कृषि संकट केवल किसान का संकट नहीं रहेगा—यह आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा, पानी, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट बन जाएगा।
छत्रपाल सिंह






