नई दिल्ली, 23 अक्टूबर, 2026 (छत्रपाल सिंह): भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम ब्रह्मोस एयरोस्पेस की ओर से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का हल्का और उन्नत संस्करण ब्रह्मोस-NG (नेक्स्ट जनरेशन) विकसित किया जा रहा है। इस नई मिसाइल का उद्देश्य भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ इसे अधिक प्रकार के लड़ाकू विमानों पर तैनात करने योग्य बनाना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अगले दो वर्षों में इसका पहला प्रोटोटाइप तैयार करने का लक्ष्य है, जबकि उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ने की योजना 2027-28 के आसपास की है।
आकार में छोटी, लेकिन रफ्तार में दमदार होगी ब्रह्मोस-NG
ब्रह्मोस-NG को मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल की तुलना में आकार में छोटा और वजन में हल्का बनाया जा रहा है। प्रस्तावित डिजाइन के अनुसार, इसका वजन लगभग 1.2 से 1.5 टन और लंबाई छह मीटर से कम हो सकती है। इसकी अधिकतम गति लगभग मैक 3.5 यानी ध्वनि की गति से साढ़े तीन गुना तक रखने की योजना है। हालांकि, ये विकास कार्यक्रम से जुड़े निर्धारित या अनुमानित आंकड़े हैं; अंतिम प्रदर्शन की पुष्टि परीक्षणों के बाद ही होगी।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मिसाइल को केवल भारी लड़ाकू विमानों तक सीमित रखने के बजाय हल्के विमानों पर भी एकीकृत करने की संभावनाएं बढ़ेंगी। खास तौर पर स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान के साथ इसका एकीकरण भारतीय वायुसेना के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे भविष्य में अलग-अलग श्रेणियों के लड़ाकू विमानों से लंबी दूरी के सटीक हमले करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है।
सुखोई-30MKI पर पहले से तैनात है ब्रह्मोस
भारतीय वायुसेना ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के सहयोग से सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों के एक हिस्से में बदलाव कर उन्हें हवा से प्रक्षेपित होने वाली ब्रह्मोस मिसाइल ले जाने योग्य बनाया है। ऐसे विमानों की संख्या लगभग 40 बताई गई है। इस व्यवस्था ने भारत को हवा से लंबी दूरी तक सुपरसोनिक मिसाइल दागने की क्षमता प्रदान की है।
ब्रह्मोस-NG के विकास से इस क्षमता का विस्तार संभव हो सकता है। हालांकि, तेजस पर मिसाइल की तैनाती के लिए केवल उसका वजन कम करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए विमान की संरचना, हथियार नियंत्रण प्रणाली, सॉफ्टवेयर, उड़ान सुरक्षा और मिसाइल के प्रक्षेपण से संबंधित परीक्षणों तथा प्रमाणन की प्रक्रिया भी पूरी करनी होगी।
स्वदेशी तकनीक और लखनऊ में उत्पादन पर जोर
ब्रह्मोस कार्यक्रम भारत और रूस के रक्षा तकनीकी सहयोग का प्रमुख उदाहरण है। नई पीढ़ी के संस्करण में स्वदेशी सामग्री और आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।लखनऊ में स्थापित ब्रह्मोस उत्पादन सुविधा को इस कार्यक्रम के औद्योगिक विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। यहां से 2027-28 के दौरान श्रृंखलाबद्ध उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य बताया गया है। हालांकि, वास्तविक उत्पादन की शुरुआत विकास, परीक्षण, स्वीकृति और उत्पादन संबंधी तैयारियों की प्रगति पर निर्भर करेगी।
लंबी दूरी की मिसाइल पर भी काम
ब्रह्मोस-NG के साथ-साथ लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता बढ़ाने की संभावनाओं पर भी काम किए जाने की जानकारी सामने आई है। लगभग 1,500 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाले प्रस्तावित संस्करण का जिक्र किया गया है, लेकिन इसे अभी शुरुआती विकास स्तर से जुड़ी योजना के रूप में ही देखना चाहिए। इसकी परिचालन स्थिति, अंतिम डिजाइन और समयसीमा को लेकर स्वतंत्र रूप से पुष्ट जानकारी के बिना इसे तैयार या तैनाती के करीब पहुंची मिसाइल मानना उचित नहीं होगा।मौजूदा ब्रह्मोस परिवार के विभिन्न संस्करणों की रेंज अलग-अलग हो सकती है। हवा से प्रक्षेपित संस्करण की वास्तविक परिचालन क्षमता और किसी प्रस्तावित लंबी दूरी वाले संस्करण की संभावित क्षमता को एक ही मानकर नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत वर्ष 2016 में मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) में शामिल हुआ था। इस व्यवस्था का उद्देश्य मिसाइलों और संबंधित तकनीक के प्रसार को नियंत्रित करना है। इसकी सदस्यता से भारत के लिए 300 किलोमीटर की दूरी और 500 किलोग्राम पेलोड से संबंधित निर्धारित निर्यात नियंत्रण सीमा के संदर्भ में महत्वपूर्ण बदलाव आया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी लंबी दूरी की मिसाइल का विकास या निर्यात अपने आप मंजूर हो जाता है। इसके लिए तकनीकी, कानूनी और रणनीतिक शर्तें अलग से लागू होती हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया में भी बढ़ रही रुचि
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और दक्षिण चीन सागर से जुड़े विवादों के बीच ब्रह्मोस की अंतरराष्ट्रीय मांग भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। फिलीपींस ने भारत के साथ ब्रह्मोस तटीय रक्षा मिसाइल प्रणाली की खरीद का समझौता किया है। इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे देशों की ओर से भी इस प्रणाली में रुचि की खबरें सामने आती रही हैं, हालांकि प्रत्येक देश की बातचीत, संभावित खरीद और अंतिम अनुबंध की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
तटीय रक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली एंटी-शिप मिसाइलें समुद्र में विरोधी युद्धपोतों को निशाना बनाने की क्षमता देती हैं। ऐसे हथियार समुद्री मार्गों की सुरक्षा, तटीय निगरानी और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में भूमिका निभा सकते हैं। भारत के लिए ब्रह्मोस का निर्यात रक्षा उत्पादन, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।
भारत की रक्षा क्षमता के लिए क्यों अहम है यह परियोजना?
ब्रह्मोस-NG का महत्व केवल एक नई मिसाइल विकसित करने तक सीमित नहीं है। हल्के लड़ाकू विमानों के साथ इसका संभावित एकीकरण, स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा, हथियार प्रणालियों के आधुनिकीकरण और निर्यात के अवसर इसे व्यापक रक्षा रणनीति का हिस्सा बनाते हैं। फिर भी इसकी वास्तविक उपयोगिता का आकलन प्रोटोटाइप परीक्षणों, विमान के साथ सफल एकीकरण, परिचालन प्रमाणन और उत्पादन शुरू होने के बाद ही किया जा सकेगा।
यदि परियोजना निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप आगे बढ़ती है, तो ब्रह्मोस-NG भारतीय वायुसेना को भविष्य में अधिक विविध लड़ाकू बेड़े से सुपरसोनिक सटीक हमले करने का विकल्प दे सकती है।






