Wednesday, November 4, 2026
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15 वर्षों से 33 एकड़ भूमि में पराली जलाए बिना खेती कर रहे हैं किसान मनजीत सिंह खोख

नाभा/पटियाला, 4 नवंबर, 2026 (छत्रपाल सिंह): पटियाला जिले के नाभा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गांव खोख के प्रगतिशील किसान मनजीत सिंह पुत्र जरनैल सिंह पिछले 15 वर्षों से अपनी 33 एकड़ जमीन में धान की पराली को आग लगाए बिना खेती कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण और कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए उनके द्वारा की जा रही यह पहल अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

किसान मनजीत सिंह फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। धान की कटाई के समय सुपर एसएमएस (Super SMS) वाली कंबाइन की मदद से पराली को खेत में समान रूप से फैलाया जाता है। इसके बाद मल्चर का इस्तेमाल करके पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर जमीन पर बिछाया जाता है। पलटावें हल (एम.बी. प्लाऊ) के माध्यम से पराली को मिट्टी में दबाकर मिलाने से जमीन में जैविक पदार्थ और जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने में मदद मिलती है।

मनजीत सिंह फसल विविधीकरण और फसल चक्र को भी महत्व देते हैं। वे धान की फसल के बाद आलू की बुवाई करते हैं, जबकि घरेलू उपयोग के लिए गेहूं की खेती भी उचित तरीके से करते हैं। विभिन्न फसलों की खेती और फसल अवशेषों का सही प्रबंधन कृषि संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल तथा जमीन की सेहत बनाए रखने में सहायक हो सकता है।

पिछले 15 वर्षों से पराली को आग न लगाने के कारण उन्होंने फसल अवशेषों को खेती में ही उपयोग करने की मिसाल कायम की है। पराली जलाने से पैदा होने वाले धुएं और वायु प्रदूषण से बचाव के साथ-साथ खेतों में फसल अवशेषों को सुरक्षित रखने से मिट्टी के लाभदायक जीवों और पोषक तत्वों के संरक्षण में भी मदद मिलती है। इससे मिट्टी की सेहत सुधारने और खेती को लंबे समय तक लाभदायक बनाए रखने की संभावनाएं बढ़ती हैं।

किसान मनजीत सिंह की यह पहल दर्शाती है कि आधुनिक कृषि मशीनरी और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर पराली का उचित प्रबंधन किया जा सकता है। उनके जैसे प्रगतिशील किसान पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में टिकाऊ खेती के तरीकों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

पराली को आग लगाने के बजाय खेतों में ही उसका उचित प्रबंधन करना आज के समय की महत्वपूर्ण जरूरत है। किसानों द्वारा ऐसे पर्यावरण अनुकूल तरीके अपनाने से वायु प्रदूषण कम करने, मिट्टी की सेहत बेहतर बनाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

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