विश्व, 1 सितंबर, 2026 (गुरप्रीत सिंह): ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका की ओर से ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद अब आर्थिक प्रतिबंधों को और सख्त करने की रणनीति अपनाई जा रही है। हालांकि, इन प्रतिबंधों से ईरान को कितना प्रभावित किया जा सकेगा, इसे लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी सेना की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित लारक द्वीप पर मिसाइल और हवाई हमले किए जाने की जानकारी सामने आई है। अमेरिका का दावा है कि इस द्वीप का इस्तेमाल ईरानी नौसेना समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने के लिए कर रही थी। दूसरी ओर, ईरान की ओर से भी अमेरिका के सहयोगी देशों के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन हमले किए जाने के दावे किए गए हैं। इन घटनाओं के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। यह मार्ग वैश्विक स्तर पर तेल की आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों का किया विरोध
अमेरिका की ओर से ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों के खिलाफ भी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। चीन ने इन प्रतिबंधों को एकतरफा और गैरकानूनी बताते हुए इसका विरोध किया है। चीन ईरान का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार और ईरानी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां जारी रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।
ईरान पर दबाव बढ़ाने की कोशिश
अमेरिका का रुख अब सीधे सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में भी दिखाई दे रहा है। हालांकि, ईरान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करता आ रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। ईरान की जमीनी सीमाएं कई देशों से जुड़ी होने के कारण उसके व्यापारिक रास्तों को पूरी तरह बंद करना भी मुश्किल माना जा रहा है। इसी वजह से नई पाबंदियां अमेरिका के उद्देश्यों को कितना हासिल कर पाएंगी, इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है।
मौजूदा टकराव का प्रभाव सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र के देशों, वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी इसका असर पड़ने की संभावना है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक जारी रहने वाला तनाव क्षेत्रीय स्थिरता के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है।






