बेसिक पे और डी.ए. तक सीमित रखने पर शिक्षकों में रोष; यूजीसी के 2018 के नियमों के अनुसार अधिकार देने की मांग
देवीगढ़, 24 अक्टूबर, 2026 (गुरमीत सिंह तुंग): पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में हुई सिंडिकेट की बैठक में कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के वेतनमान को लेकर लिए गए फैसले से पंजाबी यूनिवर्सिटी कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स एसोसिएशन (पुकटा) में रोष पैदा हो गया है। शिक्षकों को पूरा वेतनमान देने के आश्वासनों के बावजूद केवल बेसिक पे और महंगाई भत्ते (डी.ए.) तक सीमित व्यवस्था को मंजूरी मिलने के कारण विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
इस संबंध में पुकटा के मीडिया सलाहकार डॉ. तेजिंदर पाल सिंह ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि अधिकारियों की ओर से पूरा वेतनमान देने के आश्वासन दिए गए थे, तो सिंडिकेट के फैसले में उन आश्वासनों की स्पष्ट झलक दिखाई देनी चाहिए थी।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों की मांग केवल वेतन में बढ़ोतरी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें लागू नियमों के अनुसार मिलने वाले वित्तीय लाभ और उचित सम्मान देना भी जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे वेतनमान के नाम पर पुकटा के साथ भद्दा मजाक किया है। सिंडिकेट के फैसले ने कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुकटा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. दलवीर सिंह ने कहा कि अपनी मांगों को लेकर पिछले 67 दिनों से चल रहा धरना अब समाप्ति के करीब पहुंच गया है। सिंडिकेट की बैठक के अगले दिन विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से धरने पर बैठे कॉन्ट्रैक्ट सहायक प्रोफेसरों को सिंडिकेट में पारित वेतनमान के बारे में जानकारी दी गई। इसमें सामने आया कि वर्ष 2023 से मिल रहे भत्तों में से हाउस रेंट और मेडिकल भत्ता हटा दिया गया है।
उन्होंने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट सहायक प्रोफेसर भी नियमित सहायक प्रोफेसरों की तरह अपने कार्यस्थल पर उपस्थित रहते हैं, इसलिए वे भी मकान किराया भत्ते के हकदार हैं। नियमित सहायक प्रोफेसरों को नियुक्ति के बाद से मकान किराया भत्ता, मेडिकल भत्ता और मोबाइल भत्ता मिलता है। ऐसे में कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों को इन सुविधाओं से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए।
पुकटा के कानूनी सलाहकार प्रो. सुरिंदर सिंह ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के वेतन से जुड़े मामले पर यूजीसी के 2018 के नियमों, संबंधित न्यायालयों के आदेशों और विश्वविद्यालय की ओर से पारित सिंडिकेट प्रस्ताव के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि लागू नियमों के अनुसार शिक्षकों को कोई वित्तीय लाभ दिया जाना है, तो उन्हें इन लाभों से वंचित रखने के फैसले की कानूनी जांच होनी चाहिए।






