पटियाला, 29 अक्टूबर, 2026 (गुरमीत सिंह तुंग): भाषा विभाग पंजाब की ओर से यहां भाषा भवन में मशहूर शायर साहिर लुधियानवी की याद में ‘बज़्म-ए-शायरी’ के बैनर तले उर्दू मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें देश के नामचीन शायरों ने अपनी रचनाओं से समां बांधा। मुशायरे की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर डॉ. अज़ीज़ परिहार ने की, जबकि दिल्ली से आए जनाब सलमान सईद ने मंच संचालन किया।
भाषा निदेशक जसवंत सिंह ज़फ़र ने कहा कि पंजाब की धरती की अपनी विशिष्ट पहचान है, जहां अनेक भाषाओं का विकास हुआ है। पूरे दक्षिण एशिया में भौगोलिक, भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर अनेक समानताएं हैं। उन्होंने कहा कि हमारे गुरुओं ने भी इस बहुरंगी क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से वाणी एकत्रित करके श्री गुरु ग्रंथ साहिब की रचना की। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में फारसी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। इसके बाद फारसी और अन्य भाषाओं के मेल से उर्दू जैसी आपसी मेल-जोल को बढ़ावा देने वाली भाषा का विकास हुआ। उन्होंने कहा कि हमें अपनी इस विविधता पर गर्व करना चाहिए और इसका सम्मान करना चाहिए।
मुशायरे की शुरुआत मालेरकोटला से आए ज़फ़र अहमद ज़फ़र ने अपनी ग़ज़ल ‘मेरे दिल की आरज़ू…’ से की। इसके बाद परमिंदर शौख ने ‘ना था महफूज़ पहले भी कहीं सच बोलने वाला…’ ग़ज़ल के माध्यम से मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों पर कटाक्ष किया। मोहम्मद मुअज्जम सैफी ने बेटियों के महत्व पर आधारित अपना कलाम पेश किया।
चंडीगढ़ से आईं शायरा शहनाज़ भारती ने तरन्नुम में तीन ग़ज़लें प्रस्तुत कर खूब वाहवाही बटोरी। पटियाला के शायर अमरदीप अमर ने अपने शेरों से श्रोताओं का मन मोह लिया। दिल्ली से आईं मोहतरमा मुस्कान मजीद ने आधुनिक समाज में बेटियों की स्थिति पर आधारित ग़ज़ल सुनाई। अमृतपाल शैदा ने जोशीले अंदाज में शेर और ग़ज़लें सुनाकर मुशायरे में नया रंग भर दिया।
सलमान सईद ने ‘हम हैं जंजीरों की खनखन से बिगाड़े हुए लोग, तेरी पाजेब की छन-छन में नहीं आ सकते’ जैसे शेरों के माध्यम से प्रेम और साहस के भाव प्रस्तुत किए। बीकानेर से आईं शायरा प्रियंवदा इल्हान ने युवा दिलों की भावनाओं को अभिव्यक्त करती ग़ज़लें सुनाकर खूब दाद हासिल की।
लुधियाना से आए मुकेश आलम ने ‘हर बात सुने इतना मजबूर नहीं है, ये दिल तेरा मशकूर है, मजदूर नहीं है’ जैसे शेर सुनाकर श्रोताओं को बार-बार तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। बिलाल सहारनपुरी ने ‘अदब कहते हैं जिसको वो अदाकारी न हो जाए, मुझे डर है मेरा लहजा भी दरबारी न हो जाए’ जैसे शेरों के माध्यम से देश की मौजूदा राजनीति और व्यवस्था पर गंभीर व्यंग्य किया। उनके शेरों ने मुशायरे को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

मुशायरे की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अज़ीज़ परिहार ने उर्दू भाषा को सम्मान और प्रोत्साहन देने के लिए भाषा विभाग पंजाब का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस मुशायरे में उर्दू ग़ज़ल के विभिन्न रंग देखने को मिले। उनके अनुसार, उर्दू शायरी मूल रूप से चेतना के प्रवाह का एक बड़ा स्रोत है, जो जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने और समझने का एहसास पैदा करती है। अंत में उन्होंने अपनी दो ग़ज़लों के साथ मुशायरे का समापन किया।
उर्दू विभाग के प्रभारी सतपाल सिंह चहल की देखरेख में आयोजित इस कार्यक्रम का मंच संचालन शोध अधिकारी डॉ. मनजिंदर सिंह ने प्रभावशाली ढंग से किया। कार्यक्रम के अंत में सभी शायरों को विभाग की ओर से शॉल और पुस्तकें भेंट कर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर एसडीएम गुरदेव सिंह धम्म, पद्मश्री प्राण सभरवाल, भाषा विभाग के सहायक निदेशक अमरिंदर सिंह, सुखप्रीत कौर, सुरिंदर कौर, जसप्रीत कौर और देविंदर कौर, शोध अधिकारी डॉ. संतोख सुखी, शिरोमणि कवि बलविंदर संधू, डॉ. अमरजीत सिंह, डॉ. आशा किरण, इंजीनियर रमिंदरजीत सिंह, विभाग के पूर्व उपनिदेशक अशरफ महमूद नंदन, इंजीनियर अमरजीत सिंह, नवदीप मुंडी, डॉ. गुरसेवक लंबी, सुखविंदर सिंह फूल, शायर डॉ. संदीप शर्मा, लक्ष्मी नारायण भीखी, अभिनेता बलविंदर बुलट और हर्षजोत कौर सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।






