दिड़बा, 2 जुलाई, 2026: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के दिशा-निर्देशों के तहत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर द्वारा मिट्टी के स्वास्थ्य संरक्षण, खेती की लागत कम करने, खराब गुणवत्ता वाले सिंचाई जल के उचित प्रबंधन तथा रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गांव मुंशीवाला (दिड़बा के निकट) में किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया।
इस शिविर में लगभग 30 किसानों ने भाग लिया। शिविर की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने किसानों को मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, धान एवं बासमती की पौध के लिए जैव उर्वरकों के टीकों के महत्व तथा धान में फॉस्फोरस उर्वरक के अनावश्यक उपयोग से बचने संबंधी वैज्ञानिक जानकारी दी।
डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने किसानों को खराब गुणवत्ता वाले सिंचाई जल के उचित प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि अधिक लवण (नमक) वाले पानी का लगातार उपयोग करने से भूमि की उर्वरता और स्वास्थ्य प्रभावित होता है। ऐसे पानी का उपयोग कुछ मात्रा में नहरी पानी के साथ मिलाकर किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि क्षारीय (सोडियम कार्बोनेट अथवा सोडियम बाइकार्बोनेट युक्त) पानी का उपयोग जिप्सम मिलाकर किया जा सकता है। इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि ट्यूबवेल के पानी की जांच मिट्टी एवं जल परीक्षण प्रयोगशाला से कराई जाए, ताकि यह पता चल सके कि उसमें किस प्रकार की और कितनी समस्या है।
उन्होंने कहा कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग से न केवल खेती की लागत कम होती है, बल्कि फसल की पैदावार बढ़ती है और मिट्टी के स्वास्थ्य में भी सुधार होता है।
डॉ. गर्ग ने किसानों से धान और बासमती की खेती में डीएपी उर्वरक का अनावश्यक उपयोग न करने तथा यूरिया का भी आवश्यकता अनुसार और संतुलित मात्रा में प्रयोग करने की अपील की। उन्होंने विशेष रूप से खेत की तैयारी (कद्दू) से पहले यूरिया के 2–3 बैग डालने की प्रथा से बचने की सलाह दी। उन्होंने धान में जिंक की कमी को दूर करने के लिए केवल अनुशंसित मात्रा में ही जिंक का उपयोग करने की सिफारिश की।
जैव उर्वरकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ. गर्ग ने बताया कि धान की पौध पर लगाया जाने वाला एजोस्पाइरिलम (Azospirillum) जैव उर्वरक फसल की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य में सुधार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने धान की नर्सरी तैयार करने के लिए अनुशंसित उर्वरकों तथा अन्य कृषि प्रबंधन संबंधी सुझावों की भी विस्तार से जानकारी दी।
इस दौरान डॉ. गर्ग ने धान की नर्सरी में लगने वाले बौने पौध रोग की पहचान एवं रोकथाम के संबंध में भी किसानों को जानकारी दी तथा नर्सरी की नियमित निगरानी करने के लिए प्रेरित किया।
शिविर की सफलता में सरदार संदीप सिंह, सरदार अमरजीत सिंह (पूर्व सरपंच), सरदार अमृतपाल सिंह (सरपंच), सरदार जोगा सिंह तथा सरदार लखविंदर सिंह का विशेष योगदान रहा।
शिविर के दौरान कृषि साहित्य की बिक्री भी की गई। साथ ही किसानों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों के वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित ढंग से उत्तर दिए गए।






