पंजाब, 25 जुलाई 2026 (मनोज वर्मा): मोहाली जिले के रतवाड़ा गांव के 43 वर्षीय किसान अमनदीप सिंह ने प्राकृतिक खेती की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया है। उनका मानना है कि खेती तभी लंबे समय तक लाभकारी और टिकाऊ बन सकती है, जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर की जाए। केवल 7 एकड़ जमीन पर उन्होंने खेती, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण को इस तरह जोड़ा है कि उनका खेत एक आत्मनिर्भर प्राकृतिक चक्र की तरह काम कर रहा है।
पशुओं के लिए खुद तैयार करते हैं पौष्टिक आहार
अमनदीप सिंह के परिवार के पास 25 दुधारू पशु हैं, जिनमें 19 भैंसें और 6 गायें शामिल हैं। पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए वह बाजार के बजाय अपने स्तर पर संतुलित देसी आहार तैयार करते हैं। इसमें मक्का, गेहूं, सरसों की खल, तारामीरा, मेथी, अजवाइन, सोयाबीन और विभिन्न प्रकार की दालों को शामिल किया जाता है। मौसम के अनुसार पशुओं के आहार में बदलाव भी किया जाता है। गर्मियों में जौ और सर्दियों में गन्ना व गुड़ दिया जाता है।
पराली नहीं जलाते, अपनाते हैं प्रकृति आधारित खेती
अमनदीप ने कभी भी खेतों में पराली को आग नहीं लगाई। उनका कहना है कि कृषि अवशेषों का सही प्रबंधन मिट्टी और पर्यावरण दोनों के लिए जरूरी है। मुफ्त बिजली उपलब्ध होने के बावजूद वह बादल वाले दिनों में ट्यूबवेल चलाने से बचते हैं और धान की खेती के लिए भूजल पर निर्भरता कम करने का प्रयास करते हैं। वह वर्षा जल के उपयोग को प्राथमिकता देते हैं। उनके ये प्रयास प्रकृति आधारित समाधान (Nature Based Solutions) की अवधारणा से मेल खाते हैं।
रासायनिक मुक्त उत्पादन और खुद का बाजार मॉडल
अमनदीप पिछले करीब 20 वर्षों से बासमती की खेती कर रहे हैं। इसके साथ ही वह आलू, साग, पालक और मेथी जैसी सब्जियों का उत्पादन भी करते हैं। उन्होंने अपने खेत में आम, अंजीर, आलूबुखारा, लीची, नाशपाती और सेब के पौधे लगाकर एक छोटा फल बाग भी विकसित किया है।
उनका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी खेती को बढ़ावा देना है जिसमें किसान की आमदनी के साथ-साथ मिट्टी, पानी और पर्यावरण का संरक्षण भी हो सके। अमनदीप सिंह का फार्म आज प्राकृतिक और टिकाऊ कृषि का एक सफल मॉडल बनकर उभर रहा है।






