25 जुलाई, 2026 (जतिंदर गर्ग): समय बदलने के साथ भले ही लोगों की जीवनशैली आधुनिक हो गई हो, लेकिन कुछ पारंपरिक चीजों की अहमियत आज भी बनी हुई है। गर्मियों के मौसम में मिट्टी के घड़े का इस्तेमाल इसका एक उदाहरण है। घड़े में रखा पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है और उसमें मिट्टी की सोंधी खुशबू लोगों को आज भी अपनी ओर आकर्षित करती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, मिट्टी के घड़े का पानी सामान्य रूप से शरीर के अनुकूल तापमान पर रहता है। यह न तो बहुत ज्यादा ठंडा होता है और न ही गर्म, जिससे गले और शरीर पर अचानक तापमान परिवर्तन का असर कम पड़ता है। यही वजह है कि कई लोग गर्मियों में फ्रिज के पानी की जगह घड़े का पानी पीना पसंद करते हैं।
मिट्टी के घड़े में पानी रखने से प्राकृतिक शीतलता बनी रहती है। आयुर्वेद में भी मिट्टी के बर्तनों में रखे पानी और भोजन को लाभकारी माना गया है। माना जाता है कि घड़े का पानी पाचन क्रिया को बेहतर रखने में मदद करता है और शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
गांवों और कस्बों में आज भी गर्मियों के दौरान मिट्टी के घड़ों की मांग देखने को मिलती है। बदलते समय के साथ कुम्हारों ने भी घड़ों को नए डिजाइन और सुविधाओं के साथ तैयार करना शुरू कर दिया है। अब बाजार में नल लगे हुए घड़े भी उपलब्ध हैं, जिससे उनका इस्तेमाल और आसान हो गया है।
हालांकि आधुनिक उपकरणों और बदलती जीवनशैली के कारण मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने आर्थिक चुनौतियां बढ़ गई हैं। कुम्हारों का कहना है कि पहले जहां मिट्टी आसानी से और कम कीमत पर मिल जाती थी, वहीं अब कच्चे माल की लागत काफी बढ़ गई है। इसके अलावा लोगों का रुझान फ्रिज, वाटर कूलर और प्लास्टिक के कंटेनरों की ओर बढ़ने से घड़ों की बिक्री प्रभावित हुई है।
पहले ग्रामीण इलाकों में फसल कटाई के समय किसान खेतों में पानी ले जाने के लिए मिट्टी के घड़ों का इस्तेमाल करते थे। कई जगहों पर कुम्हार अनाज के बदले घड़े उपलब्ध कराते थे, लेकिन अब मशीनों से खेती और आधुनिक पानी रखने के साधनों के कारण यह परंपरा लगभग खत्म हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी के बर्तनों का उपयोग पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर विकल्प हो सकता है। यही कारण है कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी मिट्टी के घड़े अपनी पारंपरिक पहचान और उपयोगिता बनाए हुए हैं।






