Wednesday, November 4, 2026
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हिमाचल में वैज्ञानिकों की बड़ी पहल: प्राकृतिक फंगस से सेब के बागों में कीट नियंत्रण की उम्मीद, रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की तैयारी

हिमाचल प्रदेश, 29 अक्टूबर, 2026 (चौधरी प्रभजीत सिंह): रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल कम करने और खेती को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में हिमाचल प्रदेश के शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की फफूंद (फंगस) पर किए जा रहे शोध से उम्मीद जगी है कि इनकी मदद से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।

शोध के दौरान क्लोनोस्टैचिस नामक फंगस ऊनी एफिड कीटों को खत्म करने में प्रभावी पाई गई है। प्रयोगशाला में उत्साहजनक परिणाम मिलने के बाद अब सेब के बागों में इसकी प्रभावशीलता की जांच की जा रही है। यह शोध हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) के शोधकर्ता दिनेश कुमार कर रहे हैं। इस कार्य में शिमला स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के क्षेत्रीय केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संतोष वाटपाड़े और सहायक प्रोफेसर डॉ. नीलम कुमारी मार्गदर्शन कर रहे हैं। इस शोध को हाल ही में केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया।

कीटों को प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित करने पर शोध

शोधपत्र के अनुसार, कीटों में बीमारी पैदा करने वाली फफूंद को एंटोमोपैथोजेनिक फंगी  कहा जाता है। ये प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव हैं, जो कीटों और अन्य छोटे जीवों को संक्रमित करके उन्हें मार सकते हैं। इस प्रकार की फफूंद का उपयोग भविष्य में जैविक कीटनाशकों के विकास में किया जा सकता है।

शोधकर्ता इन फफूंद को संक्रमित कीटों, मिट्टी और पौधों से जुड़े प्राकृतिक वातावरण से एकत्र करते हैं। इसके बाद उनकी पहचान और अलग-अलग परीक्षण किए जाते हैं, ताकि पता लगाया जा सके कि कौन-सी फफूंद किस प्रकार के कीट पर कितना प्रभाव डालती है और विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में कितनी प्रभावी रहती है।

ऐसा शोध भविष्य में एकीकृत कीट प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने में मदद कर सकता है, जिसमें रासायनिक कीटनाशकों के साथ-साथ जैविक और अन्य पर्यावरण-अनुकूल उपायों का भी इस्तेमाल किया जाता है।

कई प्रकार की फफूंद की पहचान

अध्ययन के दौरान एकैंथोमाइसीज, ब्यूवेरिया, क्लोनोस्टैचिस, कॉर्डिसेप्स, लेसीकैनिलियम, लियांगिया, परप्यूरियोसिलियम और सैमसोनीएला सहित विभिन्न समूहों की फफूंद की पहचान की गई। इनका अध्ययन उनकी संरचना और आणविक विशेषताओं के आधार पर किया गया।

इसके लिए ITS, बीटा-ट्यूबुलिन, LSU, TEF-1 अल्फा, RPB1 और RPB2 जैसे आनुवंशिक मार्करों का उपयोग किया गया। इन तकनीकों की मदद से फफूंद की पहचान अधिक सटीक तरीके से करने और उनकी जैविक विशेषताओं को समझने में सहायता मिलती है।

खेतों में इस्तेमाल से पहले सुरक्षा जांच जरूरी

वैज्ञानिकों के अनुसार, इन फफूंद का खेतों में उपयोग करने से पहले उनकी प्रभावशीलता, सुरक्षा और व्यावहारिक परिणामों का विस्तृत परीक्षण करना आवश्यक है। प्रयोगशाला में अच्छे परिणाम मिलना एक महत्वपूर्ण शुरुआती उपलब्धि है, लेकिन बड़े स्तर पर उपयोग की सफलता खेतों में होने वाले परीक्षणों पर निर्भर करेगी।

डॉ. संतोष वाटपाड़े ने बताया कि क्लोनोस्टैचिस फंगस ऊनी एफिड कीटों को नियंत्रित करने में प्रभावी पाई गई है और आने वाले वर्षों में यह सेब के बागों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। उनके अनुसार, प्रयोगशाला में इसके परिणाम अच्छे रहे हैं और अब क्षेत्रीय स्तर पर इसकी जांच जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि फफूंद की अन्य प्रजातियों से भविष्य में उपयोगी जैविक उत्पाद विकसित करने की संभावनाएं हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खेतों में भी ये फफूंद प्रभावी और सुरक्षित साबित होती हैं, तो इससे टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने, रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

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